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स्वामित्व विवाद में किरायेदारी के मुकदमा लघु वाद न्यायालय नहीं सुनेगा, हाई कोर्ट का नया आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किरायेदारी के मुकदमे में स्वामित्व का विवाद गंभीर, वास्तविक और जटिल होने पर लघु वाद न्यायालय को मुकदमा खारिज करने की बजाय वाद-पत्र लौटाने का निर्देश दिया है।

27 जून 2026 को 10:23 pm बजे
स्वामित्व विवाद में किरायेदारी के मुकदमा लघु वाद न्यायालय नहीं सुनेगा, हाई कोर्ट का नया आदेश

सौजन्य से:- Jagran

'स्वामित्व के गंभीर विवाद में लघु वाद न्यायालय नहीं सुन सकता मुकदमा', हाई कोर्ट ने 15 साल पुराना आदेश पलटा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि स्वामित्व के गंभीर विवाद वाले किरायेदारी के मुकदमों को लघु वाद न्यायालय खारिज नहीं कर सकता, बल्कि वाद-पत्र को नियमित स ...और पढ़ें

HighLights

- स्वामित्व विवाद गंभीर होने पर लघु वाद न्यायालय मुकदमा नहीं सुनेगा।

- हाई कोर्ट ने वाद-पत्र लौटाकर सिविल कोर्ट भेजने का निर्देश दिया।

- एटा के 15 साल पुराने किरायेदारी मामले में आया यह फैसला।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि अगर किरायेदारी के मुकदमे में स्वामित्व का विवाद गंभीर, वास्तविक और जटिल है तो लघु वाद न्यायालय (स्माल काज कोर्ट) को मुकदमा खारिज करने की बजाय वाद-पत्र लौटाकर नियमित सिविल कोर्ट भेज देना चाहिए।

न्यायमूर्ति डा. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एटा निवासी याची सुरेश शाह सिसोदिया की याचिका स्वीकार कर ली है और लघु वाद न्यायालय का 30 अक्टूबर 2025 का वह फैसला रद कर दिया, जिसमें बेदखली का मुकदमा खारिज कर दिया गया था।

याची ने वर्ष 2010 में लघु वाद दायर किया। दावा किया कि वह सात नवंबर 2008 को श्री राज राजेश्वर महाराज महादेव जी मंदिर के प्रबंधकों द्वारा निष्पादित रजिस्टर्ड लीज डीड से विवादित दुकान के मालिक बने। विपक्षी जय प्रकाश यादव पहले से 3500 रुपये महीने पर किरायेदार था। लीज के बाद याची पुराने मकान मालिक की जगह आ गया।

उसने किराया बकाया, बेदखली, कब्जा और हर्जाने का मुकदमा किया था। लघु वाद न्यायालय ने मुकदमा खारिज कर दिया। याची ने प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम 1887 की धारा 25 के तहत रिवीजन दाखिल कर फैसले को चुनौती दी।हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने खुद माना था कि दो प्रतिस्पर्धी टाइटल चेन हैं और विवाद गंभीर है। न्यायमूर्ति ने कहा कि एक बार जब कोर्ट इस नतीजे पर पहुंच जाए कि स्वामित्व का गंभीर विवाद है तो उसे गुण-दोष पर मुकदमा तय करने से बचना चाहिए और कानून में बताई प्रक्रिया अपनानी चाहिए, यानी वाद-पत्र लौटाना।

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धारा 23 में मुकदमा खारिज करने की बात नहीं है। प्रकरण को ‘क्षेत्राधिकार की त्रुटि’ बताते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कानून से मिले अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया और सीमित अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर मुद्दे तय कर दिए। याचिका मंजूर करते हुए कोर्ट ने स्माल काज कोर्ट को निर्देश दिया कि वह धारा 23 के तहत वादी को वाद-पत्र लौटा दे ताकि वह सक्षम सिविल कोर्ट में पेश कर सके।

कोर्ट की राय में स्माल काज कोर्ट किराया-बेदखली के लिए है। अगर मालिकाना हक का बड़ा विवाद सामने आ जाए तो वह केस नहीं सुन सकता। ऐसे में मुकदमा खारिज करना गलत होगा, वाद-पत्र लौटाना ही सही प्रक्रिया है।

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