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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 2020 संहिता के लिए 1978 की 'उद्योग' परिभाषा नए मामलों पर नहीं होगी लागू - supreme court big decision 1978 industry definition not for 2020 code cases

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 2020 संहिता के लिए 1978 की 'उद्योग' परिभाषा नए मामलों पर नहीं होगी लागू सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 1978 के 'उद्योग' की व्यापक परिभाषा 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के तहत नए मामलों प…

20 अगस्त 2026 को 06:54 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 2020 संहिता के लिए 1978 की 'उद्योग' परिभाषा नए मामलों पर नहीं होगी लागू
 - supreme court big decision 1978 industry definition not for 2020 code cases

सौजन्य से:- Jagran

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 2020 संहिता के लिए 1978 की 'उद्योग' परिभाषा नए मामलों पर नहीं होगी लागू

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 1978 के 'उद्योग' की व्यापक परिभाषा 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी।

HighLights

- 1978 की 'उद्योग' परिभाषा 2020 संहिता पर लागू नहीं।

- 1947 अधिनियम के लंबित मामले 1978 फैसले से तय होंगे।

- 'ट्रिपल टेस्ट' मान्य, पर नए मामलों में उपयोग नहीं।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में कहा कि 'उद्योग' (इंडस्ट्री) शब्द की 1978 के फैसले की 48 वर्ष पुरानी और कर्मचारियों के पक्ष वाली व्यापक व्याख्या 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ की कुछ मुद्दों पर अलग-अलग राय थी, लेकिन पीठ ने 6:3 के बहुमत वाले फैसले में कहा कि 'उद्योग' की परिभाषा पर सात जजों की पीठ के 1978 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाला संदर्भ वैध तरीके से दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

प्रधान न्यायाधीश ने अपने और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की ओर से बहुमत वाला फैसला लिखा। कई मुद्दों पर जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जोयमाल्या बागची ने भी उनसे सहमति जताई।

जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्जल भुइयां नौ जजों की पीठ को भेजे गए संदर्भ की स्वीकार्यता पर बहुमत के फैसले से असहमत थे।

प्रधान न्यायाधीश ने निर्णय सुनाते हुए साफ किया कि जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर द्वारा 1978 के फैसले में विकसित 'ट्रिपल टेस्ट या तीन शर्तें' (यह पता लगाने के लिए कि 'उद्योग' क्या है) मान्य रहेंगी।

सीजेआइ ने कहा कि इस फैसले में 'तीन शर्तों' को बेहतर बनाया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल अब रद हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित या निपटाए जा चुके मामलों में नहीं किया जा सकता।

बहुमत के फैसले में यह भी साफ किया गया कि इसमें 2020 की संहिता पर विचार नहीं किया गया है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "2020 की संहिता की धारा 2(पी) में 'उद्योग' का भविष्य औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(जे) की व्याख्या से प्रभावित नहीं होगा।

परिणामस्वरूप 1947 के अधिनियम के तहत अदालतों, ट्रिब्यूनलों, श्रम प्राधिकारियों या किसी भी फोरम के सामने लंबित किसी भी कार्यवाही का फैसला बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड (1978) के फैसले में धारा 2(जे) की व्याख्या के अनुसार किया जाएगा।"

जस्टिस नरसिम्हा ने प्रधान न्यायाधीश की बात से सहमति जताई और कहा कि नई संहिता लागू होने के बाद धारा 2(जे) की आधिकारिक व्याख्या का महत्व खत्म हो गया है।

बहुमत की राय से असहमति जताते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि 1978 के फैसले के विरुद्ध नौ जजों की पीठ को मामला भेजना गैरजरूरी था और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता था।

जस्टिस दत्ता, जिन्होंने अपने और जस्टिस भुइयां की ओर से फैसला लिखा, ने जस्टिस नागरत्ना की इस बात से सहमति जताई। जस्टिस बागची ने जस्टिस नागरत्ना की इस बात से सहमति जताई कि 1978 के फैसले में "उद्योग" के दायरे और सीमा को सही ढंग से तय किया गया था।

गौरतलब है कि 1978 के फैसले में "उद्योग" शब्द का दायरा बढ़ाया गया था। इस फैसले से अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, क्लबों और सरकारी कल्याण विभागों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी औद्योगिक विवाद अधिनियम के दायरे में आ गए थे।

इसमें तय की गईं तीन शर्तों के अनुसार मोटे तौर पर कोई भी ऐसी व्यवस्थित गतिविधि जिसमें सामान व सेवाओं के उत्पादन या वितरण के लिए नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग शामिल हो, उसे "उद्योग" माना जाएगा।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

यह भी पढ़ें- माइंस एंड मिनरल्स संशोधन कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी कर्नाटक-केरल-तेलंगाना सरकार

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