मोदी सरकार के इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगी 3 राज्यों की सरकारें, जानें केरल-कर्नाटक और तेलंगाना क्यों कर रहे विरोध
कर्नाटक, तेलंगाना और केरल की सरकार हाल ही में संसद में पास हुए मोदी सरकार के एक कानून का विरोध कर रही हैं। तीनों सरकारें मिलकर इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाली हैं। राज्य सरकारों का कहना है की मोदी सरकार के नए क…

सौजन्य से:- Navbharat Times
कर्नाटक, तेलंगाना और केरल की सरकार हाल ही में संसद में पास हुए मोदी सरकार के एक कानून का विरोध कर रही हैं। तीनों सरकारें मिलकर इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाली हैं। राज्य सरकारों का कहना है की मोदी सरकार के नए कानून से उनके राज्य के राजस्व पर असर पड़ सकता है।
नई दिल्ली: कांग्रेस शासित कर्नाटक, केरल और तेलंगाना की सरकारें केंद्र के हाल में पारित माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में हैं। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, तीनों राज्यों की ओर से दायर की जाने वाली याचिका तैयार कर ली गई है और इसे अगले कुछ दिनों में शीर्ष अदालत में दाखिल किया जा सकता है। कांग्रेस का आरोप है कि नए कानून के जरिए राज्यों की खनिजों और खनिज-युक्त जमीन पर टैक्स, सेस या अन्य लेवी लगाने की शक्तियों को सीमित किया गया है। पार्टी का कहना है कि यह प्रावधान राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर सीधा असर डालता है।
लोकसभा में 5 मिनट में पास हुआ कानून
यह कानून संसद के हाल में संपन्न मॉनसून सत्र में विपक्ष के विरोध के बीच पारित हुआ था। विपक्षी दलों ने विधेयक को आगे की जांच के लिए संसदीय स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की थी। हालांकि, लोकसभा में विधेयक करीब पांच मिनट में पारित हो गया। राज्यसभा में करीब 50 मिनट की चर्चा के बाद इसे मंजूरी दी गई, जिसमें 12 सदस्यों ने बहस में हिस्सा लिया। बाद में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विधेयक को मंजूरी दे दी।
2024 के फैसले को निष्प्रभावी करने का आरोप
कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि नए कानून का मकसद 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के उस महत्वपूर्ण फैसले के प्रभाव को खत्म करना है, जिसमें राज्यों के खनिजों पर रॉयल्टी से अलग टैक्स लगाने के अधिकार को बरकरार रखा गया था। संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि रॉयल्टी टैक्स नहीं है और खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति अलग है। कांग्रेस का तर्क है कि संसद के नए कानून के जरिए उस संवैधानिक स्थिति को बदलने की कोशिश की गई है। पार्टी इसी आधार पर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
खनिज वाले राज्यों की आय पर असर की चिंता
नए कानून को लेकर सबसे बड़ी चिंता खनिज संपदा वाले राज्यों की संभावित राजस्व हानि को लेकर है। खासतौर पर लौह अयस्क के बड़े उत्पादक कर्नाटक के लिए इसके दूरगामी वित्तीय प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। केरल कांग्रेस के नेताओं ने भी कानून को संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है। केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने पहले कहा था कि कानून राज्यों के खनिजों पर उनके अधिकार और स्वामित्व को प्रभावित करता है और इससे राज्यों के अधिकारों में कटौती होती है।
स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की थी
कांग्रेस सांसद एस. ससिकांत सेंथिल ने विधेयक को संसद की कोयला, खान और इस्पात संबंधी स्थायी समिति के पास भेजने की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा था। उन्होंने कहा था कि प्रस्तावित कानून राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त जमीन पर टैक्स, सेस या अन्य लेवी लगाने की शक्तियों पर महत्वपूर्ण प्रतिबंध’ लगाता है।
स्वायत्तता पर पड़ सकता है गंभीर असर
सेंथिल ने यह भी कहा था कि विधेयक केंद्र सरकार को राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों में शर्तें और प्रतिबंध तय करने की पावर देता है। कांग्रेस सांसद ने विधेयक में कुछ टैक्स, सेस और लेवी को पिछली तारीख से अमान्य करने के प्रावधान पर भी सवाल उठाया था। उनके मुताबिक, ऐसे प्रावधानों का खनिज उत्पादक राज्यों की आय और उनकी वित्तीय स्वायत्तता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
लेखक के बारे मेंहेमंत राजौराहेमंत राजौरा नवभारत टाइम्स में स्पेशल करेस्पॉन्डेंट हैं। वह कांग्रेस, सपा, आरजेडी सहित प्रमुख विपक्षी दलों की राजनीति को गहराई से कवर करते हैं। साथ ही, स्वास्थ्य, विज्ञान और नीति से जुड़ी अहम खबरों पर भी उनकी पैनी नजर रहती है। ग्राउंड रिपोर्टिंग, विश्लेषण की स्पष्टता और विश्वसनीय सूत्रों तक मजबूत पहुंच उनकी पत्रकारिता की पहचान है।... और पढ़ें
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