सुप्रीम कोर्ट ने बदली 8 साल पुराना तलाक समझौता: बच्ची को मिली माँ की पूर्ण कस्टडी, सौतेले पिता का नाम और उनका धर्म
कोर्ट ने बच्ची के हित को प्राथमिकता देते हुए उसकी माँ को पूर्ण कस्टडी दी और उसे अपने सौतेले पिता का नाम अपनाने तथा उनके परिवार के धर्म को मानने की अनुमति दी। इस निर्णय के साथ दोनों अभिभावकों के बीच दायर सभी मामलों को निरस्त कर दिया गया।

सौजन्य से:- ABP News
बच्ची को मिला सौतेले पिता का नाम और धर्म... सुप्रीम कोर्ट ने बदला 8 साल पुराना समझौता
बच्ची के माता-पिता के बीच 2019 में तलाक हुआ था. इस तलाक की डिक्री 2018 में दोनों के बीच हुए समझौते के आधार पर जारी की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने एक बच्ची के हित और उसकी इच्छा को महत्व देते हुए उसके माता-पिता के बीच हुए तलाक समझौते की शर्तें बदल दी हैं. अब बच्ची की पूरी कस्टडी मां को सौंप दी गई है. साथ ही, उसे अपने सौतेले पिता का नाम अपनाने और अपने मौजूदा परिवार के धर्म को मानने की अनुमति दे दी गई है. कोर्ट ने मां को बच्ची के स्कूल रिकॉर्ड और पहचान से जुड़े दस्तावेजों में जरूरी बदलाव कराने का पूरा अधिकार दिया है.
बच्ची के माता-पिता के बीच 2019 में तलाक हुआ था. इस तलाक की डिक्री 2018 में दोनों के बीच हुए समझौते के आधार पर जारी की गई थी. दोनों को बच्ची की संयुक्त कस्टडी दी गई थी. माता-पिता अलग-अलग समुदायों से थे. समझौते में मां ने बच्ची की परवरिश पिता के धर्म यानी इस्लाम के मुताबिक करने की बात कही थी.
बच्ची की कस्टडी को लेकर विवाद
इस तलाक के बाद दोनों ने दूसरी शादी कर ली और परिस्थितियां बदल गईं. बच्ची की कस्टडी को लेकर दोनों के बीच विवाद रहने लगा. मां ने बच्ची के साथ दुर्व्यवहार की शिकायत करते हुए पिता के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज करवाया. पिता ने भी तलाक के मामले में हुए समझौते का पालन न करने के लिए मां के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की. मां ने दोनों मामलों को अपने वर्तमान शहर में ट्रांसफर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
मामले को सुनते हुए जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने इसकी विशेष परिस्थितियों पर गौर किया. विवाद के स्थाई समाधान के लिए उन्होंने माता-पिता और बच्ची से विस्तार से बात की. जजों से बात करते हुए विशेष ज़रूरतों वाली बच्ची ने कहा कि उसे अपने मौजूदा परिवार से बहुत लगाव है. वह पूरी तरह से उस परिवार की होकर रहना चाहती है.
जजों से बातचीत के दौरान बच्ची ने पूछा था कि वह उस पिता का नाम क्यों नहीं अपना सकती, जो उसके साथ रहता है और उसकी देखभाल करता है? बच्ची का कहना था कि वह वैसा ही सामान्य जीवन जीना चाहती है, जैसा उसके दोस्त जी रहे हैं. इस बातचीत के आधार पर कोर्ट ने माना है कि पुरानी व्यवस्था अब बच्ची के हित में नहीं है.
कोर्ट ने बच्ची की इच्छा को सर्वोच्च महत्व देते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया और उसके माता-पिता के बीच हुए तलाक की शर्तों को बदल दिया. इसके साथ ही माता-पिता की तरफ से एक दूसरे के खिलाफ दर्ज करवाए गए सभी मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है.
बच्ची को परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने में परेशानी
कोर्ट ने इस बात को आदेश में दर्ज किया है कि बच्ची बहुत तेज समझ रखने वाली है, लेकिन उसे परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने में गंभीर परेशानी हो रही है. वह अपने सौतेले पिता से काफी जुड़ गई है और अपने नाम मे उनका नाम जोड़ना चाहती है. जजों ने अपने लिखित आदेश में कहा है, "बच्ची ने जो इच्छा जताई है, हम उसका सम्मान करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जैविक पिता की तरफ से अतीत में किए गए दुर्व्यवहार और दर्ज करवाए गए मुकदमे का बच्ची पर बुरा असर पड़ा है. उससे मिलने के जैविक पिता के अधिकार को जारी रखना उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. जजों ने उम्मीद जताई है कि समय के साथ बच्ची के मन में पिता को लेकर बैठा डर कम हो जाएगा.
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