बॉम्बे हाईकोर्ट ने चाँद तक की प्रगति के बीच जाति‑व्यवस्था की कड़वी निंदा की
हाईकोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में भारत चाँद के दूसरे हिस्से तक पहुँचना मानता है, परन्तु सीवर‑नाल सफाई में जाति‑आधारित शोषण अभी भी चल रहा है। कोर्ट ने सरकार को छह महीने में सभी शहादत श्रमिकों की पहचान, उनके आश्रितों को 30 लाख रुपये मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था करने का आदेश दिया, तथा स्थानीय निकायों को तुरंत मुआवजा देकर बाद में ठेकेदारों से वसूलने का निर्देश दिया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Bombay High Court News: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सीवर और नालों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर तल्ख टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में भारत चांद के दूसरे हिस्से तक पहुंचने की बात करता है लेकिन देश में जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई अब भी मौजूद है।
मुंबई: सीवर और नालों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि 21वीं सदी में भारत चांद के दूसरे हिस्से तक पहुंचने की बात करता है। पर देश में जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई अब भी मौजूद है। यही व्यवस्था एक खास समुदाय के लोगों को पीढ़ियों से अमानवीय काम करने के लिए मजबूर करती है। इसे देखते हुए कोर्ट ने सरकार को छह महीने के भीतर सफाई के दौरान मारे गए सभी श्रमिकों की पहचान करने का निर्देश दिया है। प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने के साथ उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने का भी आदेश दिया गया है।
कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की बेंच ने कहा कि संविधान समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसके बावजूद मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और कानूनों के बावजूद इस अमानवीय प्रथा का जारी रहना गंभीर चिंता का विषय है। मामला महाराष्ट्र सरकार के 2019 और 2025 के शासनादेशों से जुड़ा था। इन आदेशों में निजी सोसायटियों और ठेकेदारों के यहां काम करने वाले सफाईकर्मियों की मौत होने पर मुआवजे की जिम्मेदारी संबंधित निजी संस्था या ठेकेदार पर डाली गई थी। जिसे कोर्ट में एक संस्था कोर्ट में चुनौती दी थी।
स्थानीय निकाय मृतक के आश्रितों को तत्काल मुआवजा देंगे
बेंच ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि खतरनाक सफाई के दौरान किसी कर्मचारी की मौत होती है तो राज्य या स्थानीय निकाय मृतक के आश्रितों को तत्काल मुआवजा देंगे और बाद में संबंधित निजी व्यक्ति, संस्था या ठेकेदार से राशि वसूल सकते हैं। बेंच ने कहा कि सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी केवल मुआवजा देने तक सीमित नहीं है। उन्हें 2013 के कानून के तहत सफाईकर्मियों और उनके आश्रितों के पुनर्वास के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।
नियोक्ता के आधार पर भेदभाव नहीं
बेंच ने कहा कि सफाईकर्मी सरकारी संस्थान में काम कर रहा हो या निजी क्षेत्र में, उसके जीवन का मूल्य समान है। मुआवजे के अधिकार में नियोक्ता के आधार पर अंतर नहीं किया जा सकता।
लेखक के बारे मेंकृष्णा शुक्लाखबरों से लगाव ने कृष्णा शुक्ला की 2007 में मुंबई नवभारत से पत्रकारिता की शुरुआत कराई।
2011 में दैनिक भास्कर के मुंबई ब्यूरो में 12 साल की सेवा ने पत्रकारिता को पहचान दिलाई।
अप्रैल 2023 से नवभारत टाइम्स के जरिए पहचान की परीक्षा जारी है।
कोर्ट रिपोर्टिंग से विशेष प्रेम है। कृष्णा को साहित्य, मनोविज्ञान और
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