बडगाम कोर्ट के फैसले ने बदली मुस्लिम विवाह की कानूनी समझ, जानें क्या हुआ
बडगाम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मुस्लिम विवाह को कानूनी रूप से सिद्ध करने के लिए निकाहनामा जरूरी नहीं है। अदालत ने मौखिक गवाही पर विश्वास करते हुए पति के वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दिया है।

सौजन्य से:- Jagran
मुस्लिम विवाह के लिए निकाहनामा जरूरी नहीं? बडगाम कोर्ट के इस फैसले ने बदल दी कानूनी समझ, जानें अदालत ने क्या कहा
बडगाम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि विश्वसनीय मौखिक गवाही के आधार पर मुस्लिम विवाह को कानूनी रूप से सिद्ध किया जा सकता है, भले ही निकाहनामा औपचारिक रूप ...और पढ़ें
HighLights
- विश्वसनीय मौखिक गवाही से मुस्लिम विवाह कानूनी रूप से सिद्ध हो सकता है।
- मुस्लिम पर्सनल लॉ में निकाहनामा विवाह की वैधता हेतु अनिवार्य नहीं।
- बडगाम कोर्ट ने पति के वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दिया।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। एक स्थानीय अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि साक्ष्य विश्वसनीय और निर्विवाद हों, तो केवल मौखिक गवाही के आधार पर भी मुस्लिम विवाह को कानूनी रूप से सिद्ध किया जा सकता है, भले ही निकाहनामा औपचारिक रूप से प्रस्तुत या प्रमाणित न किया गया हो।
जिला बडगाम की न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) तस्नीम कावूस ने वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना से जुड़े एक मामले में आंशिक फैसला सुनाते हुए पति के पक्ष में निर्णय दिया। अदालत ने पत्नी को पति के साथ वैवाहिक संबंध पुनः स्थापित करने का निर्देश दिया।
मामले में पति ने दावा किया था कि उसका विवाह 25 जुलाई 2022 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। हालांकि निकाहनामा और अन्य दस्तावेज रिकॉर्ड में मौजूद थे, लेकिन उन्हें साक्ष्य नियमों के तहत औपचारिक रूप से सिद्ध नहीं किया गया।
मामले में अपना पक्ष रखने के लिए पत्नी को अदालत में बुलाया गया,लेकिन वह उपस्थित नहीं हुई और न ही उसने कोई जवाब दाखिल किया, जिससे पति के दावे को चुनौती नहीं मिली। अदालत ने टिप्पणी की कि जिन तथ्यों का खंडन नहीं किया जाता, उन्हें स्वीकार किया हुआ माना जा सकता है।
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साक्ष्यों के आधार पर विवाह सिद्ध हो चुका है
अदालत के समक्ष प्रस्तुत पति की गवाही और दो गवाहों के बयान भी किसी भी प्रकार से विवादित नहीं किए गए। अदालत ने माना कि इन साक्ष्यों के आधार पर विवाह सिद्ध हो चुका है।
निर्णय में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निकाहनामा विवाह की वैधता के लिए अनिवार्य नहीं है, बल्कि विवाह एक नागरिक अनुबंध है जो प्रस्ताव (इजाब) और स्वीकृति (कुबूल) तथा सक्षम गवाहों की उपस्थिति में संपन्न होता है। अदालत ने यह भी पाया कि विवाह के कुछ समय बाद पत्नी बिना वैध कारण के ससुराल छोड़कर चली गई और पति के बुलावे के बावजूद वापस नहीं लौटी।
इसी आधार पर अदालत ने पति के पक्ष में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दिया। हालांकि, पत्नी के रिश्तेदार के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया, क्योंकि आरोप अस्पष्ट थे और उनके समर्थन में ठोस सबूत नहीं थे।
अंततः अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दिया। हालांकि पति ने अदालत में आग्रह किया था कि उसकी पत्नी के कुछ रिश्तेदारों को उनके जीवन में दखल देने से रोका जाए,लेेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया।
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