सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट को दी संज्ञान की शक्ति: सीएपीएफ कर्मियों की सेवा समाप्ति से जुड़े मामले
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के कर्मियों की सेवा समाप्ति से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट भी इनकी सुनवाई कर सकता है।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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CAPF: सीएपीएफ के कर्मियों की सेवा समाप्ति के मामलों पर 'सुप्रीम' फैसला, कहा- सुनवाई कर सकता है दिल्ली हाईकोर्ट
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 09 Jun 2026 07:45 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के कर्मियों से जुड़े सेवा संबंधी मामलों पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि वे दिल्ली हाईकोर्ट में भी कानूनी चुनौती दे सकते हैं, भले ही विवाद या घटना किसी अन्य राज्य में हुई हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित केंद्रीय प्राधिकरणों और वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालय दिल्ली में होने के कारण दिल्ली हाईकोर्ट को क्षेत्राधिकार प्राप्त है। यह टिप्पणी एक बीएसएफ जवान की बर्खास्तगी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई।
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट कहा कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के कर्मियों, जिनमें सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सदस्य भी शामिल हैं, की सेवा समाप्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट कर सकता है, भले ही मामले से जुड़ा कारण राष्ट्रीय राजधानी के बाहर उत्पन्न हुआ हो।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह आदेश एक बीएसएफ कांस्टेबल की याचिका को फिर से बहाल करते हुए दिया। कांस्टेबल ने बिना किसी पेंशन लाभ के सेवा से बर्खास्त किए जाने को चुनौती दी थी। कांस्टेबल को इस आधार पर सेवा से बर्खास्त किया गया था कि उसने पहली शादी के रहते और पहली पत्नी की अनुमति के बिना दूसरी शादी की थी।
2022 में बर्खास्त कर दिया गया था बीएसएफ कर्मी
बीएसएफ कर्मी को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के नारायणपुर में, जहां उसकी तैनाती थी, कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। कांस्टेबल निर्धारित अवधि के भीतर जवाब दाखिल नहीं कर सका। इसके बाद 2022 में कमांडेंट ने उसे बिना किसी पेंशन लाभ के सेवा से बर्खास्त कर दिया। बर्खास्तगी के आदेश से असंतुष्ट कांस्टेबल ने सेवा में बहाली की मांग करते हुए वैधानिक याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया।
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सेवा से बर्खास्तगी और वैधानिक याचिका खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती देते हुए कांस्टेबल ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने फोरम नॉन कन्वीनियंस (असुविधाजनक मंच) के सिद्धांत को लागू करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा था कि इस याचिका की सुनवाई के लिए वह उचित या सुविधाजनक मंच नहीं है। कांस्टेबल ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उसने याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय में इसलिए दायर की क्योंकि बीएसएफ के महानिदेशक और गृह मंत्रालय के कार्यालय दिल्ली में स्थित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, "हम यह मानते हैं कि अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) का कोई भी सदस्य, जिसमें बीएसएफ भी शामिल है, सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी सेवा समाप्ति के किसी प्रशासनिक आदेश से प्रभावित है। तो भले ही कारण कहीं और उत्पन्न हुआ हो, अर्थात उक्त आदेश दिल्ली हाईकोर्ट की क्षेत्रीय सीमा से बाहर किसी स्थान से जारी किया गया हो या ऐसे आदेश को जन्म देने वाली घटनाएं उसकी सीमा के बाहर हुई हों, तब भी संविधान के अनुच्छेद 226 के खंड (1) के तहत भारत संघ तथा बीएसएफ के महानिदेशक/अन्य सीएपीएफ में पर्यवेक्षण और कमान का अधिकार रखने वाले अधिकारी के कार्यालय के स्थान के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय को क्षेत्राधिकार प्राप्त होगा।"
दिल्ली हाईकोर्ट ने किया सिद्धांत का गलत इस्तेमाल
अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट ने "फोरम नॉन कन्वीनियंस" के सिद्धांत का गलत इस्तेमाल किया। पीठ ने कहा, "यह अनुच्छेद प्रतिवादी के कार्यालय के स्थान और उस कारण के आधार पर रिट याचिका दायर करने की अनुमति देता है, जिससे कार्रवाई का अधिकार उत्पन्न होता है। जहां संवैधानिक उपचार प्राप्त करने का प्रश्न शामिल हो और रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल अनुच्छेद 226 के खंड (1) के तहत किया गया हो, वहां 'फोरम नॉन कन्वीनियंस' का सिद्धांत शायद ही कभी लागू होगा।"
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह आदेश एक बीएसएफ कांस्टेबल की याचिका को फिर से बहाल करते हुए दिया। कांस्टेबल ने बिना किसी पेंशन लाभ के सेवा से बर्खास्त किए जाने को चुनौती दी थी। कांस्टेबल को इस आधार पर सेवा से बर्खास्त किया गया था कि उसने पहली शादी के रहते और पहली पत्नी की अनुमति के बिना दूसरी शादी की थी।
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2022 में बर्खास्त कर दिया गया था बीएसएफ कर्मी
बीएसएफ कर्मी को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के नारायणपुर में, जहां उसकी तैनाती थी, कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। कांस्टेबल निर्धारित अवधि के भीतर जवाब दाखिल नहीं कर सका। इसके बाद 2022 में कमांडेंट ने उसे बिना किसी पेंशन लाभ के सेवा से बर्खास्त कर दिया। बर्खास्तगी के आदेश से असंतुष्ट कांस्टेबल ने सेवा में बहाली की मांग करते हुए वैधानिक याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया।
सेवा से बर्खास्तगी और वैधानिक याचिका खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती देते हुए कांस्टेबल ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने फोरम नॉन कन्वीनियंस (असुविधाजनक मंच) के सिद्धांत को लागू करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा था कि इस याचिका की सुनवाई के लिए वह उचित या सुविधाजनक मंच नहीं है। कांस्टेबल ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उसने याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय में इसलिए दायर की क्योंकि बीएसएफ के महानिदेशक और गृह मंत्रालय के कार्यालय दिल्ली में स्थित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, "हम यह मानते हैं कि अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) का कोई भी सदस्य, जिसमें बीएसएफ भी शामिल है, सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी सेवा समाप्ति के किसी प्रशासनिक आदेश से प्रभावित है। तो भले ही कारण कहीं और उत्पन्न हुआ हो, अर्थात उक्त आदेश दिल्ली हाईकोर्ट की क्षेत्रीय सीमा से बाहर किसी स्थान से जारी किया गया हो या ऐसे आदेश को जन्म देने वाली घटनाएं उसकी सीमा के बाहर हुई हों, तब भी संविधान के अनुच्छेद 226 के खंड (1) के तहत भारत संघ तथा बीएसएफ के महानिदेशक/अन्य सीएपीएफ में पर्यवेक्षण और कमान का अधिकार रखने वाले अधिकारी के कार्यालय के स्थान के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय को क्षेत्राधिकार प्राप्त होगा।"
दिल्ली हाईकोर्ट ने किया सिद्धांत का गलत इस्तेमाल
अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट ने "फोरम नॉन कन्वीनियंस" के सिद्धांत का गलत इस्तेमाल किया। पीठ ने कहा, "यह अनुच्छेद प्रतिवादी के कार्यालय के स्थान और उस कारण के आधार पर रिट याचिका दायर करने की अनुमति देता है, जिससे कार्रवाई का अधिकार उत्पन्न होता है। जहां संवैधानिक उपचार प्राप्त करने का प्रश्न शामिल हो और रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल अनुच्छेद 226 के खंड (1) के तहत किया गया हो, वहां 'फोरम नॉन कन्वीनियंस' का सिद्धांत शायद ही कभी लागू होगा।"
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इसका मतलब क्या है
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सीएपीएफ के कर्मियों को उनकी सेवा समाप्ति से संबंधित मामलों में कानूनी चुनौती देने का नया तरीका मिलेगा। यह फैसला उनके अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है और उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट में अपने मामले रखنे का अधिकार देता है, भले ही घटना या विवाद任何 अन्य राज्य में हुआ हो।
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