लोक अदालत के आदेश के बाद कॉलेज प्रबंधन में हड़कंप क्यों?
देवरिया में सलेमपुर स्थित रैनाथ ब्रह्मदेव पीजी कॉलेज में छात्रा का मूल अंकपत्र 14 वर्षों तक रोकने के मामले में कॉलेज प्रबंधन को कड़ा सजा सुनाई गई। अदालत ने कॉलेज के अधिकारियों को 20 लाख का प्रतिकर तथा 10 हजार अतिरिक्त भुगतान करने का आदेश दिया।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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Deoria News: लोक अदालत के आदेश के बाद कॉलेज प्रबंधन में मचा हड़कंप
Wed, 01 Jul 2026 11:41 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Wed, 01 Jul 2026 11:41 PM IST
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देवरिया। सलेमपुर स्थित रैनाथ ब्रह्मदेव पीजी कॉलेज में छात्रा का मूल अंकपत्र 14 वर्षों तक रोककर रखने के मामले में स्थायी लोक अदालत द्वारा कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कड़ा फैसला सुनाए जाने के बाद कॉलेज प्रबंधन में हड़कंप मच गया है।
अदालत ने कॉलेज के प्रबंधक, प्राचार्य और वरिष्ठ लिपिक को छात्रा को 20 लाख प्रतिकर तथा 10 हजार अतिरिक्त अदा करने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में इसे शिक्षण संस्थान की गंभीर लापरवाही और विद्यार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन माना।
वर्ष 2011-12 में एमए उत्तीर्ण करने वाली छात्रा सरिता देवी का मूल अंकपत्र कॉलेज प्रबंधन ने अंक सुधार कराने के नाम पर अपने पास जमा करा लिया था। छात्रा ने कई बार अंकपत्र वापस करने का अनुरोध किया, मगर कॉलेज प्रशासन ने उसे उपलब्ध नहीं कराया। अंकपत्र के अभाव में वह वर्षों तक नौकरी और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित रही।
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लगातार 14 वर्षों तक अंकपत्र न मिलने पर सरिता देवी ने स्थाई लोक अदालत की शरण लेते हुए कॉलेज प्रबंधन के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद दायर किया। मामले की सुनवाई के दौरान स्थाई लोक अदालत के अध्यक्ष राकेश मिश्रा ने कॉलेज प्रबंधन को नोटिस जारी किया। न्यायालय के सख्त रुख और हस्तक्षेप के बाद कॉलेज प्रशासन ने छात्रा का मूल अंकपत्र उपलब्ध कराया।
हालांकि, अदालत ने माना कि कॉलेज प्रबंधन ने अपने नैतिक एवं प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन में घोर लापरवाही बरती, जिससे छात्रा को लंबे समय तक मानसिक, सामाजिक नुकसान उठाना पड़ा।
निर्णय में अदालत ने टिप्पणी की कि यदि शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे तो शिक्षा व्यवस्था पर उनका विश्वास कमजोर होगा। इसी आधार पर अदालत ने छात्रा के पक्ष में 20 लाख रुपये प्रतिकर और 10 हजार रुपये अतिरिक्त भुगतान का आदेश पारित किया।
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अदालत ने कॉलेज के प्रबंधक, प्राचार्य और वरिष्ठ लिपिक को छात्रा को 20 लाख प्रतिकर तथा 10 हजार अतिरिक्त अदा करने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में इसे शिक्षण संस्थान की गंभीर लापरवाही और विद्यार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन माना।
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वर्ष 2011-12 में एमए उत्तीर्ण करने वाली छात्रा सरिता देवी का मूल अंकपत्र कॉलेज प्रबंधन ने अंक सुधार कराने के नाम पर अपने पास जमा करा लिया था। छात्रा ने कई बार अंकपत्र वापस करने का अनुरोध किया, मगर कॉलेज प्रशासन ने उसे उपलब्ध नहीं कराया। अंकपत्र के अभाव में वह वर्षों तक नौकरी और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित रही।
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लगातार 14 वर्षों तक अंकपत्र न मिलने पर सरिता देवी ने स्थाई लोक अदालत की शरण लेते हुए कॉलेज प्रबंधन के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद दायर किया। मामले की सुनवाई के दौरान स्थाई लोक अदालत के अध्यक्ष राकेश मिश्रा ने कॉलेज प्रबंधन को नोटिस जारी किया। न्यायालय के सख्त रुख और हस्तक्षेप के बाद कॉलेज प्रशासन ने छात्रा का मूल अंकपत्र उपलब्ध कराया।
हालांकि, अदालत ने माना कि कॉलेज प्रबंधन ने अपने नैतिक एवं प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन में घोर लापरवाही बरती, जिससे छात्रा को लंबे समय तक मानसिक, सामाजिक नुकसान उठाना पड़ा।
निर्णय में अदालत ने टिप्पणी की कि यदि शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे तो शिक्षा व्यवस्था पर उनका विश्वास कमजोर होगा। इसी आधार पर अदालत ने छात्रा के पक्ष में 20 लाख रुपये प्रतिकर और 10 हजार रुपये अतिरिक्त भुगतान का आदेश पारित किया।
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