सुप्रीम कोर्ट में हिमाचल कर्मचारी अधिनियम मामले की सुनवाई, हाईकोर्ट ने घोषित किया था असांविधानिक
हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है जिसमें राज्य सरकार की ओर से बनाए गए कर्मचारी अधिनियम को असांविधानिक घोषित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई बुधवार को होने वाली है।

सौजन्य से:- Amar Ujala
Himachal: कर्मचारी भर्ती, सेवा शर्तें अधिनियम मामले की आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर दी है, जिसमें राज्य सरकार की ओर से बनाए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती और सेवा शर्तें) अधिनियम को असांविधानिक घोषित करते हुए पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
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राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर दी है, जिसमें राज्य सरकार की ओर से बनाए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती और सेवा शर्तें) अधिनियम को असांविधानिक घोषित करते हुए पूरी तरह से रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इस मामले की सुनवाई न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की खंडपीठ करेगी। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस कानून के आधार पर कर्मचारियों को दिए जाने वाले लाभों को वापस लेने, वरिष्ठता छीनने या रिकवरी (कटौती) करने संबंधी सभी सरकारी फैसले और अस्वीकृति पत्र रद्द किए हैं।
अदालत ने सक्षम अधिकारियों को आदेश दिया है कि वह न्यायिक फैसलों और संवैधानिक प्रावधानों में पात्र कर्मचारियों को 3 महीने के भीतर उनके सेवा लाभ प्रदान करें। खंडपीठ ने 25 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि राज्य विधायिका के पास अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों को पलटने या निष्प्रभावी बनाने का कोई अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने नोट किया कि राज्य सरकार ने 12 दिसंबर 2003 से पहले नियुक्त अनुबंध कर्मचारियों को अदालती आदेशों के तहत लाभ प्रदान किए, जबकि 12 दिसंबर 2003 के बाद आर एंड पी नियमों के तहत पूरी पारदर्शी प्रक्रिया से चयनित कर्मचारियों को लाभ से वंचित करने का प्रयास किया गया। यह दोहरा रवैया अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन और मनमाना कदम है।
अनुकंपा पर नियुक्ति की जानकारी देना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में बड़ा आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को अनुकंपा के आधार पर रोजगार मांगने के अधिकार की जानकारी देना सबसे पहले विभाग की जिम्मेदारी है। विभाग की ओर से सूचित न किए जाने की स्थिति में देरी का आधार बनाकर आश्रित को उसके हक से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने बोर्ड को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता की योग्यता और उसके पिता के पद को ध्यान में रखते हुए उसे अनुकंपा के आधार पर नौकरी की पेशकश की जाए। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने याचिकाकर्ता नवीन कुमार की याचिका को स्वीकार करते हुए भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड की ओर से 24 जून 2025 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता के पिता स्व. अमर सिंह बीबीएमबी में बेलदार के पद पर कार्यरत थे और 2001 में उनका निधन हो गया। उस समय याचिकाकर्ता केवल 13 वर्ष का नाबालिग था। विभाग ने न तो उसे और न ही उसकी बहनों को इस अधिकार की कोई जानकारी दी, इसलिए देरी के आधार पर उसकी अर्जी खारिज करना पूरी तरह गलत है। वहीं विभाग ने दलील दी थी कि याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मृत्यु के 22 साल बाद नौकरी की गुहार लगाई, जबकि 1996 की नीति के तहत 2 साल के भीतर आवेदन करना अनिवार्य था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता 2001 में नाबालिग था और 2006 के आसपास वयस्क हुआ। उसने 2016 में आवेदन किया था। जब विभाग ने परिवार को अधिकार की जानकारी ही नहीं दी, तो याचिकाकर्ता को इसका संदेह लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी पाया कि एक समान मामले में बीबीएमबी ने एक अन्य नाम के व्यक्ति को पिता की मृत्यु के 27 साल बाद (और वयस्क होने के 12 साल बाद) नियमों में ढील देकर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की गई। अदालत ने कहा कि यदि विभाग उस मामले में दयालु हो सकता है, तो याचिकाकर्ता के साथ भी वही समान व्यवहार और सहानुभूति दिखाई जानी चाहिए थी।
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