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सर्विस मैटर्स में देरी से अदालत आने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दशकों पुरानी मांग वाली याचिका पर नहीं हो सकता विचार, लेक्चरर प्रमोशन से जुड़ा है केस

सर्विस मैटर्स में देरी से अदालत आने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दशकों पुरानी मांग वाली याचिका पर नहीं हो सकता विचार, लेक्चरर प्रमोशन से जुड़ा है केस हाईकोर्ट ने कहा है कि दशकों पुरानी मांग को लेकर दाखिल की गई याचिका पर वि…

21 अगस्त 2026 को 05:55 pm बजे
सर्विस मैटर्स में देरी से अदालत आने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दशकों पुरानी मांग वाली याचिका पर नहीं हो सकता विचार, लेक्चरर प्रमोशन से जुड़ा है केस

सौजन्य से:- ETV Bharat

सर्विस मैटर्स में देरी से अदालत आने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दशकों पुरानी मांग वाली याचिका पर नहीं हो सकता विचार, लेक्चरर प्रमोशन से जुड़ा है केस

हाईकोर्ट ने कहा है कि दशकों पुरानी मांग को लेकर दाखिल की गई याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : August 21, 2026 at 10:52 PM IST

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सर्विस रिलेटिड मैटर्स में बहुत अधिक देरी बाद अदालत आने वाले कर्मचारियों को लेकर स्थिति स्पष्ट की है. हाईकोर्ट ने कहा है कि दशकों पुरानी मांग को लेकर दाखिल की गई याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने ये फैसला दिया है. न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने ये स्थिति स्पष्ट करते हुए संजय कुमार नामक व्यक्ति की तरफ से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्रशासनिक निर्णय या आदेश से कई अन्य लोगों के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो दशकों पुरानी मांग को लेकर दाखिल याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता. ये केस लेक्चरर प्रमोशन से जुड़ा है.

मामले के अनुसार याचिकाकर्ता संजय कुमार ने हाईकोर्ट में मांग की थी कि उन्हें वर्ष 2009 से लेक्चरर कॉमर्स के पद पर बैक-डेट से प्रमोशन दी जाए. उनका तर्क था कि वर्ष 1973 के भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत दो साल की नियमित सेवा पूरी करने के बाद वे 2009 में ही इस पद के हकदार हो गए थे. इसके साथ ही उन्होंने सीनियोरिटी के निर्धारण, एरियर और पेंशन संबंधी लाभों की भी मांग की थी. हालांकि राज्य सरकार ने उन्हें वास्तव में 28 अगस्त 2012 को पांच साल की सेवा पूरी होने पर प्रमोट किया था.

मामले में सरकार की तरफ से दलील दी गई थी कि याचिकाकर्ता वर्ष 2009 के हक के लिए 16 साल बाद कोर्ट आया है. इसी प्रकार वर्ष 2012 में मिले प्रमोशन के 14 साल बाद वे अदालत आए हैं. इस लंबे विलंब और सुस्ती का याचिका में कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं है. सरकारी दलील में यह भी कहा कि यदि इस स्तर पर राहत दी गई, तो दूसरे अन्य प्रवक्ताओं की सीनियोरिटी प्रभावित होगी, जो उनसे पहले प्रमोट हो चुके हैं.

वहीं, हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि सैलरी या पेंशन फिक्सेशन जैसे लगातार जारी रहने वाले नुकसान के मामलों में देरी के बावजूद राहत दी जा सकती है, लेकिन यदि मामला प्रमोशन और सीनियरिटी से जुड़ा हो और जिससे दूसरों के अधिकार प्रभावित होते हों तो देरी के कारण दावा प्रभावी नहीं रह जाता है. अदालत ने कहा कि ऐसी याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

आवास आवंटन नियमों पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

वहीं, एक अन्य मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी आवासों के आवंटन के नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने कहा कि हर साल नए सिरे से सूची तैयार करने का नियम पूरी तरह तर्कहीन है. यह व्यवस्था सिर्फ फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट बनकर रह गई है. कोर्ट ने सामान्य प्रशासन विभाग को इस नियम का पुनरावलोकन करने के निर्देश दिए. यह आदेश भी न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने अमित कुमार की याचिका की सुनवाई के बाद जारी किए. हाईकोर्ट ने सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव के हलफनामे को देखने के बाद हिमाचल प्रदेश सरकारी आवास आवंटन सामान्य पूल नियम, 1994 के नियम 6 के पीछे दिए जाने वाले तर्क पर हैरानी जताई.

इस नियम के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों को आवास के लिए हर साल दोबारा आवेदन करना पड़ता है. अदालत ने कहा कि हर साल नई लिस्ट बनाना समझ से परे है. इसकी जगह विभाग को एक प्रमुख स्थाई सूची रखनी चाहिए. इस व्यवस्था में आवास मिलने वाले का नाम सूची से हटा दिया जाए. रिटायरमेंट या ट्रांसफर के कारण अपात्र हुए लोगों के नाम भी हटा दिए जाएं. कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि यदि याचिकाकर्ता अमित ठाकुर सेवा की अनिवार्यता के आधार पर आउट-ऑफ-टर्न आवास पाने के हकदार हैं, तो उन्हें मकान देने में क्या अड़चन है?

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि लोक सेवा आयोग के ही एक कर्मचारी को पहले 15.10.2023 और फिर दोबारा 22.05.2025 को सरकारी मकान आवंटित किया गया. कोर्ट ने सरकार से इस पर भी स्पष्टीकरण मांगा है. मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को निर्धारित की गई है. हाईकोर्ट ने कहा है कि दशकों पुरानी मांग को लेकर दाखिल की गई याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता.

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