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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: पर्यावरण मंजूरी को हल्के में नहीं लेना है, लेकिन व्यावहारिकता भी ध्यान में रखनी है

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी नई परियोजना पर काम शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य होगी. यह फैसला उन प्रवृत्तियों पर रोक लगाता है जो नियमों को हल्का बना देती हैं.

30 जुलाई 2026 को 06:33 am बजे
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: पर्यावरण मंजूरी को हल्के में नहीं लेना है, लेकिन व्यावहारिकता भी ध्यान में रखनी है

सौजन्य से:- AajTak

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द कर बिना पूर्व पर्यावरण मंजूरी के शुरू हुई परियोजनाओं को पिछली तारीख से ग्रीन क्लीयरेंस देने की व्यवस्था खत्म कर दी है. सुप्रीम कोर्ट का यह कदम स्वागत योग्य और नैतिक दृष्टि से सही है. अदालत ने साफ कर दिया कि अब किसी भी नई परियोजना पर काम शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य होगी. यह फैसला उन प्रवृत्तियों पर रोक लगाता है जो नियमों को हल्का बना देती हैं. अगर कोई प्रोजेक्ट शुरू कर दिया जाए और बाद में पर्यावरण अप्रूवल मिल ही जाएगा जैसी सोच नियमों को औपचारिकता भर बना देती है. यह प्रवृत्ति जरूरी पर्यावरण मानकों के उल्लंघन को बढ़ावा देती है और उस पर मुहर लगाने जैसी लगती है. इसलिए इसे रोकना किसी भी जिम्मेदार देश और समाज के लिए आवश्यक था.

पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया महज कागजी खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए. यह परियोजना के संभावित प्रभावों जैसे प्रदूषण, वनों का नुकसान, जल स्रोत और स्थानीय समुदायों का वैज्ञानिक अध्ययन सुनिश्चित करती है. बिना पूर्व मंजूरी के काम शुरू करने से ऐसा नुकसान हो सकता है, जिसे बाद में सुधारना या ठीक करना असंभव हो सकता है. इस फैसले से भविष्य की परियोजनाओं में जवाबदेही बढ़ेगी और पर्यावरण संरक्षण का विचार मजबूत होगा. मौजूदा परियोजनाओं को प्रभावित न करने का प्रावधान भी व्यावहारिक है, जिससे अचानक आर्थिक नुकसान से बचा जा सके.

फिर भी, पिछले 4 दशकों का इतिहास हमें चेतावनी देता है कि इस तरह की रोक से हमारे देश का कितना नुकसान पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हुआ है. पर्यावरण अप्रूवल के कड़े उपबंधों के चलते कई बड़े प्रोजेक्ट्स लंबे समय तक अटके रहे या बर्बाद हो गए. बांध, खनन, सड़क और उद्योग परियोजनाएं वर्षों की मुकदमेबाजी में फंस गईं, जिससे निवेश प्रभावित हुआ, रोजगार के अवसर घटे और विकास की गति धीमी पड़ी. भारत जैसे विकासशील देश के लिए पर्यावरण मानकों का बेहद कठोर अनुपालन कभी-कभी व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा करता है. तेजी से विकास के लिए बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, आवास और उद्योग की तरक्की जरूरी है.यह करोड़ों लोगों को रोजगार और बेहतर जीवन स्तर की उपलब्ध कराने के लिए बहुत जरूरी हो जाता है.अगर पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया अत्यधिक जटिल, समय लेने वाली और अनिश्चित हो जाए, तो निवेशक हतोत्साहित होते हैं और देश वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है.

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दुनिया की हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. अमेरिका और चीन जैसे देश पर्यावरण को सबसे ज्यादा प्रभावित करते रहे हैं. उन्होंने औद्योगिकीकरण के दौर में कठोर नियमों की परवाह कम की और आर्थिक शक्ति हासिल की. आज भी उनके कार्बन उत्सर्जन और संसाधन दोहन के आंकड़े हमसे कहीं ऊंचे हैं. ऐसे में पर्यावरण नियमों में पूरी तरह ढील न मिले तो वैश्विक स्तर पर सर्वाइव करना असंभव नहीं, लेकिन चुनौतीपूर्ण जरूर है. विकासशील देशों पर सख्त मानक थोपना और विकसित देशों की पुरानी गलतियों को नजरअंदाज करना दोहरे मापदंड जैसा लगता है. भारत को अपनी विकास प्राथमिकताओं और पर्यावरण जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना होगा.

इसलिए जरूरी है कि बीच का रास्ता निकाला जाए. पूर्व पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य रहे, लेकिन प्रक्रिया तेज, पारदर्शी और समयबद्ध हो. ऑनलाइन सिस्टम, स्पष्ट समयसीमा, स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा और डिजिटल निगरानी से देरी कम की जा सकती है. महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा, रक्षा या सार्वजनिक हित की परियोजनाओं के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक व्यवस्था हो, बशर्ते पर्यावरण सुरक्षा के न्यूनतम मानक पूरे हों. उल्लंघन पर सख्त दंड के प्रावधान हो, लेकिन ईमानदार डेवलपर्स को अनावश्यक बाधाओं से बचाया जाए. स्थानीय समुदायों की भागीदारी और मुआवजे की व्यवस्था मजबूत की जाए.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला नियमों को मजबूत करने की दिशा में सही है. यह संदेश देता है कि पर्यावरण मंजूरी को हल्के में नहीं लिया जा सकता. लेकिन नीति-निर्माताओं को अब इसे लागू करते हुए व्यावहारिकता भी ध्यान में रखनी होगी. कठोरता और लचीलेपन का मिश्रण ही टिकाऊ विकास का आधार बनेगा. पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक प्रगति दोनों ही राष्ट्र हित में हैं. दोनों को एक-दूसरे के विरोधी बनाने के बजाय पूरक बनाना होगा. तभी यह फैसला सिर्फ कानूनी जीत नहीं, बल्कि व्यावहारिक सफलता का मार्ग बनेगा.

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