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तिब्बती पहचान मिटाने की साजिश का आरोप, निर्वासित तिब्बती सरकार से दुनिया को एकता कानून पर हस्तक्षेप करने की अपील

चीन के नए 'एथनिक यूनिटी कानून' के विरोध में निर्वासित तिब्बती सरकार ने दुनिया से हस्तक्षेप की अपील की है। तिब्बती सरकार के अनुसार, यह कानून तिब्बती पहचान, भाषा, धर्म, संस्कृति और जीवनशैली को प्रभावित करेगा।

1 जुलाई 2026 को 06:23 pm बजे
तिब्बती पहचान मिटाने की साजिश का आरोप, निर्वासित तिब्बती सरकार से दुनिया को एकता कानून पर हस्तक्षेप करने की अपील

सौजन्य से:- ndtv.in

- चीन का नया 'एथनिक यूनिटी कानून' लागू हो गया है. निर्वासित तिब्बती सरकार ने दुनिया से हस्तक्षेप की अपील की है.

- सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के राष्ट्रपति पेनपा सेरिंग ने दुनिया भर के थिंकटैंक, सरकारों से अपील की है.

- उनका आरोप है कि यह कानून तिब्बती पहचान, पारंपरिक नामों, भाषा, धर्म, संस्कृति और लाइफस्टाइल को प्रभावित करेगा.

चीन ने पहली जुलाई से एथनिक यूनिटी ऐंड प्रोग्रेस लॉ लागू कर दिया है. इस कानून को लेकर चीन से निर्वासित तिब्बती प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है. तिब्बती प्रशासन का आरोप है कि यह कानून राष्ट्रीय एकता के नाम पर तिब्बतियों समेत अन्य जातीय समुदायों की भाषा, संस्कृति, धर्म और पहचान को खत्म करने का रास्ता तैयार करता है.

सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के राष्ट्रपति (सिक्योंग) पेनपा सेरिंग ने दुनिया भर की सरकारों, विदेश मंत्रालयों, सांसदों, थिंक टैंक और गैरसरकारी संगठनों को आधिकारिक पत्र और ऑनलाइन माध्यम से एक आपात अपील भेजी. उन्होंने कहा कि चीन इस कानून को सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता का नाम दे रहा है, लेकिन वास्तव में इसका मकसद तिब्बतियों और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों को उनकी अलग पहचान से वंचित करना है.

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में मीडिया से बातचीत के दौरान पेनपा सेरिंग ने कहा कि पिछले कुछ हफ्तों से वह इसी मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता फैलाने के लिए लगातार यात्रा कर रहे हैं. उनके मुताबिक, कानून का नाम सुनने में सकारात्मक लगता है, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य तिब्बतियों, उइगरों और पूर्वी तुर्किस्तान के लोगों की पहचान को कमजोर करना है.

उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के तहत लोगों को केवल मंदारिन भाषा बोलने के लिए मजबूर किया जाएगा और स्थानीय भाषाओं व सांस्कृतिक पहचान को धीरेधीरे खत्म किया जाएगा.

फिलहाल कोई जवाबी नीति नहीं, लेकिन तैयारी जारी

जब उनसे पूछा गया कि क्या इसके जवाब में कोई रणनीति तैयार की गई है, तो उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी नीति का जवाब एकदो दिन में तैयार नहीं किया जा सकता.

उन्होंने कहा कि पहले इस कानून के प्रभाव और इसके क्रियान्वयन का गहराई से अध्ययन किया जाएगा. उनका कहना था कि पहली जुलाई से इसकी शुरुआत होगी और उसके बाद भी तिब्बती प्रशासन लगातार दुनिया की सरकारों के साथ मिलकर चीन के इस नैरेटिव का जवाब देने की कोशिश करेगा. भविष्य में जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक प्रस्ताव भी लाए जा सकते हैं.

तिब्बती जीवन के हर पहलू पर खतरा

पेनपा सेरिंग ने दावा किया कि इस कानून में ऐसे कई प्रावधान हैं जो तिब्बती भाषा, धर्म, संस्कृति और जीवनशैली को सीधे प्रभावित करेंगे. उन्होंने कहा कि यदि यह लंबे समय तक लागू रहा तो तिब्बती पहचान धीरेधीरे समाप्त हो सकती है. उनका आरोप है कि यहां तक कि तिब्बत के पारंपरिक नामों को भी बदला जा रहा है.

तिब्बती प्रशासन ने घोषणा की है कि इस कानून के खिलाफ वैश्विक स्तर पर अभियान शुरू किया जाएगा. दुनिया के विभिन्न देशों के नेताओं से बयान जुटाए जाएंगे, विदेश मंत्रालयों से संपर्क किया जाएगा, प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित होंगी और अलगअलग देशों में प्रदर्शन किए जाएंगे.

पेनपा सेरिंग ने कहा कि यह विरोध आने वाले महीनों और वर्षों तक जारी रहेगा, जब तक इस कानून को वापस नहीं लिया जाता.

बता दें कि, चीन इस कानून को राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने वाला कदम बताता है, जबकि तिब्बती निर्वासित प्रशासन इसे तिब्बती और अन्य जातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर खतरा मानता है. दोनों पक्षों के दावों पर अलगअलग अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.

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