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सुप्रीम कोर्ट ने एनसीटीई को संस्थानों से प्रदर्शन रिपोर्ट माँगने का अधिकार मान्य किया

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को अपनी परफॉर्मेंस अप्रेज़ल रिपोर्ट (PAR) जमा करने की बाध्यता है, जिससे उनकी जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। हाई कोर्ट की पूर्व निर्णय को उलटते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने एनसीटीई को धारा 12(k) के तहत प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली विकसित करने और संस्थानों से रिपोर्ट माँगने का अधिकार दिया। यह फैसला शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता एवं पारदर्शिता को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

5 सितंबर 2026 को 10:32 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीटीई को संस्थानों से प्रदर्शन रिपोर्ट माँगने का अधिकार मान्य किया

सौजन्य से:- Navbharat Times

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि टीचिंग एजुकेशन प्रदान करने वाले संस्थानों की परफॉर्मेंस पर रिपोर्ट मांगे जाने में कोई बाध्यता नहीं है। एनसीटीई अधिनियम की धारा 12(k) काउंसिल को मान्यता प्राप्त संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली, मानक और तंत्र विकसित करने का अधिकार देती है।

NCTE ने बताया बड़ी जीत

नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) के चेयरमैन प्रो. पंकज अरोड़ा ने कहा कि यह ऐतिहासिक फैसला NCTE के कानूनी अधिकार और रेगुलेटरी अथॉरिटी की पुष्टि करता है। इससे टीचर एजुकेशन संस्थानों में सुधार करने और टीचर एजुकेशन में क्वालिटी और ईमानदारी बनाए रखने का हमारा संकल्प और मज़बूत हुआ है।देश में करीब 16000 टीचिंग संस्थान हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सिफारिशों को लागू करने की दिशा में टीचिंग प्रोग्राम की क्वॉलिटी में सुधार सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जिसके लिए टीचिंग संस्थान में क्लासरूम टीचिंग से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर का पता लगाना बहुत जरूरी है।

इसी कड़ी में परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट मांगी गई और करीब 2500 संस्थानों की रिपोर्ट नहीं आई है। बार-बार कहने के बाद भी संस्थानों ने रिपोर्ट नहीं दी। चूंकि भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा एनसीटीई का खुद का परफॉर्मेंस ऑडिट किया जाता है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि टीचिंग संस्थानों में शिक्षा की क्वॉलिटी को चेक किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या बड़ी बात कही

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी अधिकार के तहत एनसीटीई के सदस्य सचिव ने 22 सितंबर 2019 को सार्वजनिक नोटिस जारी कर मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम संचालित करने वाले संस्थानों से PAR दाखिल करने को कहा था। सितंबर 2019 में जारी सार्वजनिक नोटिस के तहत एनसीटीई से मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम चलाने वाले सभी शिक्षक शिक्षा संस्थानों को निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सालाना PAR जमा करनी थी।इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों से 5,000 रुपये, जबकि अन्य संस्थानों से 15,000 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया था। नोटिस में यह भी कहा गया था कि PAR जमा नहीं करने पर एनसीटीई अधिनियम की धारा 17(1) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। Association of NCTE Approved Colleges Trust सहित कई शिक्षक शिक्षा संस्थानों ने इस नोटिस को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट ने नोटिस कर दिया था रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला

हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने संस्थानों की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद डिवीजन बेंच ने अपील स्वीकार करते हुए एनसीटीई का नोटिस रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट की डबल बेंच बेंच का कहना था कि ऐसा कोई पर्याप्त रिकॉर्ड सामने नहीं रखा गया जिससे यह साबित हो कि PAR का प्रोफॉर्मा एनसीटीई ने तैयार या मंजूर किया था।हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि धारा 12(k) के तहत प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली विकसित करने का कार्य सदस्य सचिव को नहीं सौंपा जा सकता। एनसीटीई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी नियामक संस्था को संबंधित संस्थानों से जवाबदेही सुनिश्चित करने का अधिकार प्राप्त है, तो उसकी ओर से उस अधिकार का इस्तेमाल केवल तकनीकी आधार पर नहीं रोका जाना चाहिए।

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