सुप्रीम कोर्ट ने समझाया किसी फ़ैसले को 'Per Incuriam' कब घोषित किया जा सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'पर इनकुरियम' का सिद्धांत 'स्टेयर डेसीसिस' का अपवाद है और इसे सीमित परिस्थितियों में ही लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने तय किया कि कोई फ़ैसला 'पर इनकुरियम' तब होता है जब उसका मुख्य आधार पहले के फ़ैसले से मेल नहीं खाता या किसी ज़रूरी कानूनी प्रावधान को देखा नहीं गया हो।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
किसी फ़ैसले को 'Per Incuriam' कब घोषित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने समझाया
Shahadat
4 July 2026 3:33 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फिर से कहा कि 'पर इनकुरियम' का सिद्धांत 'स्टेयर डेसीसिस' (stare decisis - पहले के फ़ैसलों को मानने का नियम) के नियम का अपवाद है और इसे केवल सीमित परिस्थितियों में ही लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि किसी फ़ैसले को 'पर इनकुरियम' तब घोषित किया जा सकता है, जब उसका मुख्य आधार (ratio) समान या बड़ी बेंच के पहले के फ़ैसले से मेल न खाता हो, या जब उसे किसी ज़रूरी कानूनी प्रावधान पर विचार किए बिना सुनाया गया हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ये सिद्धांत तय किए। साथ ही उन्होंने माना कि 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम राज कुमार' मामले में कोर्ट का 2021 का फ़ैसला 'पर इनकुरियम' था, क्योंकि यह 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम जगदीश' मामले में तीन जजों की बेंच के पहले के फ़ैसले से मेल नहीं खाता था।
कोर्ट ने कहा कि 'पर इनकुरियम' का सिद्धांत पहले के फ़ैसलों को मानने के नियम (precedent) का अपवाद है और इसे "बहुत कम मामलों में ही लागू किया जाना चाहिए।"
बेंच ने पहले के फ़ैसलों से स्थापित कानून का सारांश देते हुए इस सिद्धांत को नियंत्रित करने वाले नियमों की पहचान की।
कोर्ट ने माना कि कोई फ़ैसला 'पर इनकुरियम' तब होता है, जब उसका मुख्य आधार (ratio) समान या बड़ी बेंच के पहले के फ़ैसले से मेल नहीं खाता, या जब किसी ज़रूरी कानूनी प्रावधान, नियम या रेगुलेशन को कोर्ट के ध्यान में नहीं लाया गया हो। यह सिद्धांत फ़ैसले के मुख्य आधार (ratio decidendi) पर लागू होता है, न कि 'ओबिटर डिक्टा' (obiter dicta - फ़ैसले में की गई अतिरिक्त टिप्पणियों) पर।
बेंच ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि न्यायिक अनुशासन के तहत समान संख्या वाली बेंच को, जो पहले के फ़ैसले से असहमत है, मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए, न कि कोई अलग राय अपनानी चाहिए। कोर्ट ने फिर से कहा कि किसी फ़ैसले (precedent) के बाध्यकारी होने का निर्धारण बेंच की संख्या से होता है, न कि किसी खास राय से सहमत जजों की संख्या से। इसलिए, कम संख्या वाली बेंच बड़ी बेंच द्वारा तय किए गए कानून से अलग नहीं हो सकती।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी फ़ैसले को कब 'पर इनकुरियम' नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कोई फ़ैसला सिर्फ़ इसलिए 'पर इनकुरियम' नहीं हो जाता कि उसमें पहले के फ़ैसले का ज़िक्र है और कोई ऐसा निष्कर्ष निकाला गया है जो सही या गलत हो सकता है। इसी तरह जहाँ फ़ैसले को सामान्य रूप से पढ़ने पर पहले के फ़ैसलों (precedents) से कोई टकराव नहीं दिखता, वहाँ अदालतों को उसे 'पर इनकुरियम' मानने से बचना चाहिए।
ये सिद्धांत हरियाणा की सज़ा में छूट (remission) की नीतियों के लागू होने से जुड़े विवाद के संदर्भ में लागू किए गए थे। कोर्ट ने पाया कि 'हरियाणा राज्य बनाम जगदीश' मामले में तीन जजों की बेंच पहले ही यह तय कर चुकी थी कि राज्य की 1993 की सज़ा में छूट (रेमिशन) की पॉलिसी, संविधान के आर्टिकल 161 के तहत गवर्नर की संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल थी और ऐसी पॉलिसी को 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर' के तहत बाद में जारी की गई कानूनी छूट पॉलिसी से बदला नहीं जा सकता।
बेंच के अनुसार, हरियाणा की 2002 की छूट पॉलिसी, 1993 की पॉलिसी जैसी ही थी क्योंकि दोनों में आर्टिकल 161 के तहत गवर्नर द्वारा छूट दिए जाने की बात कही गई। हालांकि, 'हरियाणा राज्य बनाम राज कुमार (2021)' मामले में दो जजों की बेंच ने माना कि 2002 की पॉलिसी कानूनी प्रकृति की थी और 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर' के तहत बनाई गई राज्य की 2008 की पॉलिसी ने उसकी जगह ले ली थी।
यह मानते हुए कि यह निष्कर्ष 'जगदीश' मामले के बाध्यकारी सिद्धांत (बाइंडिंग रेश्यो) के सीधे खिलाफ था, कोर्ट ने 'राज कुमार' मामले के फैसले को 'पर इनकुरियम' (कानून की अनदेखी करके दिया गया फैसला) घोषित कर दिया।
बेंच ने देखा कि 1993 और 2002 की पॉलिसी "आर्टिकल 161 के तहत शक्ति के स्रोत के मामले में एक जैसी" थीं, इसलिए जब बड़ी बेंच ने 1993 की पॉलिसी को संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल माना था, तो "अनिवार्य निष्कर्ष" यह था कि 2002 की पॉलिसी भी संवैधानिक प्रकृति की थी। कोर्ट ने कहा कि 'राज कुमार' मामले में इसके विपरीत निष्कर्ष "ऊपर बताए गए 'जगदीश' मामले के तर्क के खिलाफ होगा और इसलिए इसे 'पर इनकुरियम' माना जाएगा।"
कोर्ट ने आगे बताया कि इस मामले में बड़ी बेंच को रेफरेंस भेजने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि इस मुद्दे पर पहले से ही बड़ी बेंच का एक कंट्रोलिंग प्रेसिडेंट (मार्गदर्शक फैसला) मौजूद था।
बेंच ने कहा,
"अगर 'जगदीश' जैसा कोई कंट्रोलिंग प्रेसिडेंट नहीं होता और हम 'राज कुमार' मामले के जजों की राय से सहमत नहीं होते, तो बड़ी बेंच को रेफरेंस भेजना ही एकमात्र रास्ता होता। चूँकि बाद वाला (जगदीश का फैसला) पहले से मौजूद है, इसलिए हमारी राय में ऐसा कोई टकराव नहीं है जिस पर फैसला करने की ज़रूरत हो।"
इस सिद्धांत को चलाने वाले नियमों के समर्थन में कोर्ट ने पहले के कई फैसलों का ज़िक्र किया, जिनमें संदीप कुमार बाफना बनाम महाराष्ट्र राज्य, शाह फैसल बनाम भारत संघ, प्रदीप चंद्र परिजा बनाम प्रमोद चंद्र पटनायक, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी बनाम महाराष्ट्र राज्य और त्रिमूर्ति फ्रैगरेंस (P) लिमिटेड बनाम राज्य (NCT ऑफ़ दिल्ली) शामिल हैं।
Cause Title: PARVEEN KUMAR@ PARVEEN CHAUHAN Versus STATE OF HARYANA AND ORS.
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