सुप्रीम कोर्ट ने शहर‑बदर पर ‘मौलिक स्वतंत्रता का आघात’ का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने रायगढ़ में शहर‑बदर के आदेश को असंवैधानिक घोषित किया, कहा कि बिना नोटिस‑सुनवाई के यह नागरिक की स्वतंत्रता पर सीधा आघात है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं शील नागू ने आदेश को मनमाना और रूटीन न कहकर उसकी वैधता नाकाम ठहराई। हाईकोर्ट व डीएम के निर्णय को रद्द कर, पीड़ित को बिना रोकटोक जिलों में लौटने की आज़ादी दी गई।

सौजन्य से:- Jagran
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शहर-बदर का आदेश मौलिक स्वतंत्रता का उल्लंघन, मनमानी पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी नागरिक को उसके गृह क्षेत्र से बाहर करने (शहर-बदर) का आदेश उसकी ...और पढ़ें
HighLights
- शहर-बदर आदेश मौलिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात।
- मनमाने या रूटीन तरीके से नहीं दिया जा सकता।
- प्रक्रियागत खामियां, नोटिस-सुनवाई का अधिकार उल्लंघन।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी नागरिक को उसके गृह क्षेत्र से बाहर करने (शहर-बदर) का आदेश उसकी बहुमूल्य मौलिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात करता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह के गंभीर और कठोर कदम को कभी भी रूटीन प्रक्रिया या मनमाने तरीके से नहीं अपनाया जा सकता।
यह फैसला उस व्यक्ति की अपील पर आया, जिसे पिछले साल नवंबर में रायगढ़ और आसपास के जिलों से एक साल के लिए बाहर करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को 'कमजोर और बचाव से परे' करार दिया, क्योंकि इसके समर्थन में कोई ठोस वजह नहीं थी।
कोर्ट ने माना कि केवल कई आपराधिक मामले दर्ज होने मात्र से किसी व्यक्ति के खिलाफ शहर-बदर का आदेश पारित करने का आधार नहीं मिल जाता। इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को वस्तुनिष्ठ सामग्री के आधार पर यह बताना होता है कि ऐसा कदम वाकई जरूरी है।
कोर्ट ने प्रक्रियागत खामियों को रेखांकित करते हुए कहा कि आदेश पारित करने से पहले न तो उस व्यक्ति को नोटिस दिया गया और न ही उसका पक्ष सुनने का अवसर प्रदान किया गया। छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 की धारा 8 के तहत मिलने वाले प्रभावी सुनवाई के अधिकार का खुलेआम उल्लंघन किया गया।
हैरानी की बात यह रही कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस गंभीर कानूनी उल्लंघन को नजरअंदाज करते हुए व्यक्ति को अपील के वैधानिक विकल्प का हवाला देकर राहत देने से मना कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की "घोर प्रशासनिक और न्यायिक विफलता" करार दिया।
कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में बरी होने के बाद, पुराने आधारों पर दोबारा और बिना नोटिस के कार्रवाई करना कानून सम्मत नहीं है।
खास बात यह है कि जिस व्यक्ति पर कार्रवाई की गई थी, वह पहले के दर्ज मामलों में बरी हो चुका था और डीएम ने तब चेतावनी देकर मामला बंद कर दिया था। बाद में नए मामलों के आधार पर दोबारा शहर-बदर का आदेश दे दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना कानूनी अधिकार के प्रशासनिक अधिकारी अपने पुराने आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता। इन तमाम गंभीर टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और डीएम दोनों के आदेशों को रद करते हुए उस व्यक्ति को संबंधित जिलों में वापस जाने की पूरी स्वतंत्रता दे दी है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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