सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जमानत में न्यायाधीश नहीं थोप सकते निजी नैतिकता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत के निर्णय में न्यायाधीशों को केवल कानून और मामले के तथ्य पर विचार करना चाहिए, न कि अपनी निजी नैतिक मान्यताओं पर। इस कारण इंदौर हाई कोर्ट का जमानत से इन्कार करने वाला आदेश रद्द कर दिया गया और यौन शोषण के आरोपी को रिहाई दी गई। अदालत ने भविष्य में किसी भी आपराधिक सुनवाई में व्यक्तिगत मूल्य‑निर्णय को आधार नहीं बनाना चाहिए।

सौजन्य से:- Jagran
'जमानत में व्यक्तिगत नैतिकता नहीं थोप सकते जज', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; यौन शोषण मामले में इंदौर हाई कोर्ट का आदेश रद
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के मामलों में न्यायाधीशों के व्यक्तिगत नैतिक विचारों को आधार बनाने से मना किया है। इंदौर ...और पढ़ें
HighLights
- न्यायाधीश जमानत पर व्यक्तिगत नैतिक विचारों को आधार नहीं बना सकते।
- सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाई कोर्ट का जमानत संबंधी आदेश रद किया।
- यौन शोषण के आरोपित को जमानत देने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया।
डिजिटल डेस्क, इंदौर। जमानत के मामले में न्यायाधीश अपने व्यक्तिगत नैतिक विचार अथवा मूल्य-निर्णय को आधार नहीं बना सकते। उन्हें जमानत पर निर्णय लेते समय कानून और मामले से जुड़े न्यायिक पहलुओं पर विचार करना चाहिए। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के जमानत से इन्कार करने वाले आदेश को रद करते हुए की, इसके साथ ही यौन शोषण के आरोपित को जमानत देने का निर्देश भी दिया।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की युगल पीठ ने कहा कि न्यायालयों को जमानत के मामले में ही नहीं, बल्कि किसी आरोपित के आपराधिक मुकदमे की सुनवाई में भी न्यायाधीश के व्यक्तिगत विचार अथवा नैतिकता संबंधी मूल्य-निर्णय थोपने से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं को न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पड़ोसी द्वारा यौन अपराध का मामला
मामला रतलाम जिले के स्टेशन रोड थाने में आरोपित कान्हा उर्फ कन्हैया सिंह के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, पाक्सो अधिनियम और एससी-एसटी अधिनियम की धाराओं में दर्ज प्रकरण से जुड़ा है। आरोपित पीड़िता के परिवार के पड़ोस में किराये पर रहता था। आरोप है कि उसने नाबालिग का करीब एक माह तक यौन शोषण किया। हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 20 मार्च 2026 को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
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हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार की प्रतिष्ठा को माना था महत्वपूर्ण आधार
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट ने आरोपित की रिहाई के संभावित सामाजिक प्रभाव और पीड़ित परिवार की नैतिकता-सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी चिंताओं को महत्व देकर जमानत से इन्कार किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी ध्यान में रखा कि आरोपित 10 सितंबर 2025 से हिरासत में है और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में समय लग सकता है।
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