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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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सुविवि की वरिष्ठता सूची पर कानूनी सवाल: सुप्रीम कोर्ट का आदेश दरकिनार, जॉइनिंग तारीख को बनाया आधार
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मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (सुविवि) प्रशासन की जारी शिक्षकों की अनंतिम अंतर-वरिष्ठता सूची (टेंटेटिव सीनियरिटी लिस्ट) में बॉम की चयन मेरिट के स्थान पर कार्यग्रहण तिथि (डेट ऑफ ज्वाइनिंग) को वरिष्ठता का आधार बनाए जाने से विधिक सवाल खड़े हो गए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि एक ही भर्ती विज्ञापन के तहत चयनित सभी अभ्यर्थियों की पारस्परिक वरिष्ठता केवल समेकित मेरिट से ही निर्धारित होगी, न कि कार्यग्रहण तिथि से। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी अनंतिम सूची में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर कैडर के शिक्षकों को शामिल किया गया है। कुलसचिव द्वारा जारी अधिसूचना के तहत इस सूची पर 10 कार्य दिवसों के भीतर आपत्तियां मांगी गईं। विधिक सिद्धांतों के अनुसार, बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट द्वारा निर्धारित समय-सीमा में कार्यग्रहण करने वाले अभ्यर्थियों की वरिष्ठता चयन मेरिट के आधार पर ही तय होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब प्रभावित शिक्षकों द्वारा इस विधिक आधार पर आपत्तियां दर्ज कराई जाएंगी। ज्वाइनिंग डेट को आधार बनाने से मेरिट-1 वाले पिछड़ गए हैं, जिससे विवाद बढ़ गया है। हालांकि, कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा का कहना है कि टेंटेटिव सीनियरिटी लिस्ट पर आपत्ति आमंत्रित की हैं। आपत्तियों के परीक्षण के बाद नियमानुसार अग्रिम कार्यवाही की जाएगी।
मेरिट-1 वाले डॉ. अखिल 74वें क्रम पर, मेरिट-2 वाले हरीश 52वें पर सीनियर
अनंतिम वरिष्ठता सूची के अनुसार भू-विज्ञान विभाग में सामान्य वर्ग की प्रथम मेरिट-1 पर चयनित डॉ. अखिल कुमार द्विवेदी ने नियमानुसार दी समय-सीमा के भीतर 4 जून, 2018 को कार्यग्रहण किया था। उनसे कम अंक पाने वाले और मेरिट-2 पर चयनित हरीश कपासिया ने 12 मई, 2018 को जॉइन किया था। विवि की सूची में कार्यग्रहण तिथि को आधार बनाते हुए कपासिया को 52वें क्रम पर रखकर सीनियर घोषित किया गया है, जबकि प्रथम मेरिट प्राप्त डॉ. अखिल कुमार द्विवेदी को उनके बाद 74वें क्रम पर रखा गया है।
एक साल पहले प्रोफेसर की मेरिट भी इसी तरह विवादों में फंसकर अटकी
सुविवि प्रशासन ने एक साल पहले प्रोफेसर की मेरिट इसी कमेटी के मार्फत बनाई थी। इसका भारी विरोध हुआ। कहा गया कि नियमों को ताक पर रखा गया है। इसके बाद विवि प्रशासन को अपने आदेश से मुकरना पड़ा। जो प्रोफेसर कुलपति बन गए या सेवानिवृत्त हो गए उनका भी नाम इस लिस्ट में जोड़ दिया गया है। अब फिर से नए विवाद के बाद सुविवि के ही शिक्षविद दबी जुबान कमेटी पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या कमेटी जानबूझकर नियम अनदेखे कर असंतोष पैदा कर रही या वाकई कमेटी को नियमों की जानकारी तक नहीं है?
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