सुप्रीम कोर्ट ने 20‑साल के अलगाव वाले दंपती का वैवाहिक बंधन समाप्त, पति को स्थायी गुजारा भत्ता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी बचाना प्राथमिक उद्देश्य है, पर दो दशकों के अलगाव को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के तलाक न देने के फैसले को खारिज कर, कोर्ट ने विवाह समाप्त कर पति को सात लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com
सुप्रीम कोर्ट ने करीब 20 साल से अलग रह रहे दंपती का विवाह समाप्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शादी बचाना प्राथमिकता है लेकिन लंबे अलगाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, पति को स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने करीब 20 साल से अलग रह रहे दंपती का विवाह समाप्त करते हुए कहा कि वैवाहिक रिश्ता बचाना कानून का प्राथमिक उद्देश्य है, लेकिन लंबे अलगाव की वास्तविकताओं को भी स्वीकार करना होगा। अदालत ने कहा कि पत्नी का यह कहना कि वह वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने को तैयार है, अपने आप में पर्याप्त नहीं है, जब उसका आचरण इसके विपरीत रहा हो।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि पति-पत्नी दिसंबर 2005 से अलग रह रहे थे।
HC ने तलाक से किया था इनकार
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने तलाक देने से इनकार कर दिया था। उसका कहना था कि क्रूरता या परित्याग पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुआ। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट का निष्कर्ष खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उन्हें विवाह के बंधन में बनाए रखना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा। पत्नी ने वैवाहिक संबंध का परित्याग किया है और पति ने इस आधार पर तलाक का मामला साबित किया है।
कोर्ट ने पति को गुजारा भत्ता देने का दिया निर्देश
कोर्ट ने पति को सात लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहना यह आकलन करने में महत्वपूर्ण है कि वैवाहिक बंधन दोबारा कायम हो सकता है या नहीं। कोर्ट ने पाया कि पति उसे वापस ले जाने गया था, लेकिन उसने बिना उचित कारण साथ जाने से इनकार कर दिया। इससे उसका वैवाहिक संबंध छोड़ने का इरादा स्पष्ट है। दोनों की शादी जून 2003 में हुई थी। नवंबर 2005 में पत्नी मायके चली गई।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें
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