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1991 के लोन घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मृत आरोपी के वारिसों को संभावित 3 करोड़ रुपये

सुप्रीम कोर्ट ने 1991 के लोन घोटाले के मुकदमे को रद्द कर दिया और बचे हुए आरोपी को बरी किया। अदालत ने बताया कि नीलाम संपत्ति से बची अतिरिक्त राशि अभी भी बैंक के पास है और उसे मृतकों के कानूनी वारिसों को लौटाना चाहिए, जिससे उन्हें लगभग 3 करोड़ रुपये (ब्याज सहित) मिल सकते हैं। इस मामले की अंतिम सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।

3 सितंबर 2026 को 02:32 am बजे
1991 के लोन घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मृत आरोपी के वारिसों को संभावित 3 करोड़ रुपये

सौजन्य से:- Jagran

35 साल पुराने लोन घोटाला मामले को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद, मृतकों के परिजनों को मिल सकते हैं 3 करोड़ रुपये

सुप्रीम कोर्ट ने 1991 के एक लोन घोटाले के मामले को रद्द कर दिया है, जिसमें बैंक ने मृत आरोपियों ...और पढ़ें

HighLights

- सुप्रीम कोर्ट ने 1991 का लोन घोटाला मामला रद्द किया।

- मृतक आरोपियों के परिवारों को मिल सकते हैं 3 करोड़ रुपये।

- बैंक ने नीलाम संपत्ति का अतिरिक्त पैसा नहीं लौटाया था।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 1991 के लोन घोटाले के मामले में जिन दो आरोपियों की केस चलने के दौरान मौत हो गई थी, उनके परिवार वालों को 3 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। 15 साल के कंपाउंड इंटरेस्ट (चक्रवृद्धि ब्याज) के साथ यह रकम और बढ़ सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में बचे अकेले आरोपी को बरी करते हुए पाया कि बैंक ने 50 लाख रुपये का लोन चुकाने के लिए दो अन्य आरोपियों की संपत्ति 3.6 करोड़ रुपये में नीलाम की थी, लेकिन बाकी बची रकम उनके कानूनी वारिसों को नहीं लौटाई।

क्या है मामला?

बचा हुआ अकेला आरोपी एक ब्रांच मैनेजर था जिस पर 13.5 लाख और 10 लाख रुपये के लोन मंजूर करने और वह रकम खुद हड़प लेने का आरोप था। एफआईआर दर्ज होने के बाद बैंक ने 2010 में रिकवरी की कार्रवाई शुरू की। दो आरोपियों में से एक की संपत्ति की नीलामी से 1.2 करोड़ रुपये मिले, जिसमें से 16.4 लाख रुपये लोन की रकम और ब्याज चुकाने में इस्तेमाल किए गए।

दूसरे व्यक्ति के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई में बैंक ने उसकी संपत्ति बेचकर 2.8 करोड़ रुपये हासिल किए और 40 लाख रुपये लोन की देनदारी चुकाने में इस्तेमाल किए।

कोर्ट ने जताई हैरानी

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "लोन 1991-1992 में लिया गया था और प्रॉपर्टी की नीलामी 2010 में हुई थी। यह बात मानी गई है कि प्रॉपर्टी की नीलामी पूरी हो गई थी और बैंक का पूरा बकाया मिल गया था और भी हैरान करने वाली बात यह है जो सरकारी गवाहों के बयानों से सामने आई है कि नीलामी से मिली रकम में से लोन अकाउंट में एडजस्ट की गई रकम के अलावा जो अतिरिक्त पैसा बचा था, वह अभी भी बैंक के पास ही है।"

आरोपी बैंक अधिकारी (जो अब अकेला बचा है) को क्लीन चिट देते हुए और इस मामले को मनगढ़ंत बताते हुए बेंच ने कहा, "हमें हैरानी है कि कानूनी वारिसों का पता लगाने और उन्हें पैसा सौंपने की कोई कोशिश नहीं की गई।"

सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन बैंक की अन्ना नगर ब्रांच के मैनेजर से नीलामी से मिली रकम के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड और लोन के बदले गिरवी रखी गई प्रॉपर्टी के टाइटल डीड (स्वामित्व दस्तावेज) पेश करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि भले ही क्रिमिनल केस का निपटारा हो गया है, लेकिन वह इस मामले की आगे की सुनवाई 5 अक्टूबर को करेगी ताकि यह पक्का किया जा सके कि नीलामी से मिला अतिरिक्त पैसा कानूनी वारिसों तक पहुंच जाए।

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