बैंकों की लापरवाही: जब बड़े कर्जदारों को ढीला और छोटे उधारकर्ताओं को सख्त नियम
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से लगभग 8.09 करोड़ रुपये का लोन लेने के बाद एक कंपनी ने मुआवजे के रूप में मूलधन लौटाने की पेशकश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसका मजाक उड़ाते हुए कहा कि अगर एक भी EMI भी नहीं चुकाई, तो इसका मतलब यह है कि बैंक ने पहली किस्त का पैसा निकालने से पहले उसकी वित्तीय क्षमता का सही आकलन नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंकिंग संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता के पैसे की सुरक्षा करना है।

सौजन्य से:- Live Hindustan
₹8 करोड़ का लोन, एक भी EMI नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने SBI से पूछा- आखिर मंजूरी कैसे मिली?
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने ₹8.09 करोड़ के लोन डिफॉल्ट मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पर अहम टिप्पणी की है
- अदालत ने कहा कि बैंक बड़े कर्जदारों को लोन मंजूर करते समय अक्सर लापरवाही बरतते हैं, जबकि छोटे उधारकर्ताओं पर सख्त शर्तें लागू की जाती हैं
बैंक से लोन लेने वाले आम लोगों और बड़े उद्योगपतियों के बीच क्या वाकई अलग-अलग नियम लागू होते हैं? हाल ही में इसी सवाल पर देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐसी टिप्पणी की है, जिसने बैंकिंग व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है। एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अक्सर बैंक बड़े कर्जदारों को हजारों करोड़ रुपये का लोन मंजूर करते समय अपेक्षाकृत ढीला रवैया अपनाते हैं, लेकिन जब कोई आम व्यक्ति छोटा पर्सनल लोन लेने जाता है, तो उससे इतनी शर्तें और दस्तावेज मांगे जाते हैं कि कई बार यह प्रक्रिया परेशान करने वाली बन जाती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह बैंकों के नियमों को कमजोर करने की बात नहीं कर रही है, बल्कि प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सरल और निष्पक्ष बनाने की जरूरत पर जोर दे रही है।
यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक निजी कंपनी ने साल 2019 में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से लगभग 8.09 करोड़ रुपये का लोन लिया था। लेकिन, चौंकाने वाली बात यह रही कि कंपनी ने लोन की पहली ही किस्त नहीं चुकाई। इसके बाद महज 5-6 महीने के भीतर बैंक ने खाते को NPA (Non-Performing Asset) घोषित कर दिया और SARFAESI Act के तहत गिरवी रखी गई संपत्तियों पर कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू कर दी।
बाद में जिला मजिस्ट्रेट ने भी बैंक के पक्ष में आदेश दिया, जिसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। कंपनी का कहना था कि बैंक ने जल्दबाजी में उसके खाते को NPA घोषित किया और उसे कारोबार दोबारा शुरू करने का मौका नहीं दिया। कंपनी ने यह भी दावा किया कि वह मूलधन लौटाने के लिए तैयार थी, लेकिन बैंक ने उसके प्रस्ताव पर उचित विचार नहीं किया।
दूसरी ओर SBI का कहना था कि कंपनी ने एक भी किस्त जमा नहीं की और लगातार डिफॉल्ट करती रही। बैंक ने यह भी बताया कि कंपनी पहले ही डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) पहुंच चुकी थी, जहां उसकी याचिका लंबित थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जिसने पहली किस्त तक नहीं चुकाई और 6 साल बाद केवल मूलधन लौटाने की पेशकश की, उसे राहत देना उचित नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि कंपनी ने वैधानिक उपायों का पूरा उपयोग किए बिना सीधे सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया।
लेकिन इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने SBI की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि अगर कोई उधारकर्ता पहली ही किस्त चुकाने में असफल हो जाता है, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि लोन मंजूर करते समय बैंक अधिकारियों ने उसकी वित्तीय क्षमता का सही आकलन नहीं किया। अदालत ने कहा कि पहली किस्त का डिफॉल्ट यह दर्शाता है कि इतनी बड़ी राशि का लोन स्वीकृत करते समय आवश्यक जांच-पड़ताल शायद पूरी गंभीरता से नहीं की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंकिंग संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता के पैसे की सुरक्षा करना है। ऐसे में जमा करने वालों और ईमानदार ग्राहकों के हितों की रक्षा करना बैंकों का कर्तव्य है। अदालत ने यह भी माना कि बैंकों की लोन स्वीकृति और रिकवरी प्रक्रिया को और अधिक सरल, पारदर्शी तथा आम नागरिकों के अनुकूल बनाया जा सकता है।
हालांकि, अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश में कोई हस्तक्षेप नहीं किया और कंपनी को कोई खास राहत नहीं दी। सुप्रीम कोर्ट ने केवल इतना निर्देश दिया कि कंपनी अगर चाहे तो डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल में अंतरिम राहत की डिमांड कर सकती है। साथ ही अदालत ने दो सप्ताह तक यथास्थिति बनाए रखने को कहा और उम्मीद जताई कि इस अवधि में बैंक कोई कठोर कार्रवाई नहीं करेगा।
यह फैसला केवल एक कंपनी और SBI के विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा है। एक्सपर्ट का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में बैंकिंग प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। इससे यह बहस तेज हो सकती है कि बड़े कॉरपोरेट लोन मंजूर करने की प्रक्रिया कितनी सख्त होनी चाहिए और क्या छोटे उधारकर्ताओं के लिए लोन प्रक्रिया को वास्तव में आसान बनाया जा सकता है। अदालत का संदेश साफ है, नियम जरूरी हैं, लेकिन उनका पालन सभी के लिए समान और निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए।
लेखक के बारे में
Sarveshwar Pathakसर्वेश्वर पाठक अक्टूबर 2022 से ‘लाइव हिंदुस्तान’ में सीनियर कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में बिजनेस और ऑटो सेक्शन के लिए
काम कर रहे हैं। सर्वेश्वर बिजनेस और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की खबरों, रिव्यू और गहराई से किए गए एनालिसिस के लिए जाने जाते
हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें 7 साल से अधिक का अनुभव है, जिसमें उन्होंने अपनी मजबूत पकड़ और समझ के जरिए एक अलग
पहचान बनाई है। उन्होंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल की और वर्ष 2019 में
ईटीवी भारत के साथ अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने दैनिक जागरण और एडिटरजी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में
भी काम किया, जहां उन्होंने अपनी लेखन शैली और विश्लेषण क्षमता को और निखारा।
उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर से आने वाले सर्वेश्वर केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भागीदारी
निभाते हैं। उन्हें बाल शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जागरूकता से जुड़े अभियानों में विशेष रुचि है। अपने विश्वविद्यालय के
दिनों में उन्होंने महाराष्ट्र के गोंदिया में दो महीने से अधिक समय तक सोशल वेलफेयर से जुड़े कार्य किए, जहां उन्होंने कई
स्कूलों और विश्वविद्यालयों के छात्रों को उच्च शिक्षा के प्रति प्रेरित किया। लेखन के अलावा सर्वेश्वर को बचपन से ही
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