सुप्रीम कोर्ट का फैसला: वकीलों की अनुशासन व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की अनुशासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि वकालत का पेशा जवाबदेही और पारदर्शिता के आधुनिक मानकों पर खरा उतरने के लिए मजबूती से आगे आएगा।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
वकीलों की अनुशासन व्यवस्था का व्यापक ऑडिट कराए BCI, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित हो : सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
8 July 2026 1:18 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की अनुशासन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाने पर जोर देते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया कि वह अपने और सभी राज्य बार काउंसिलों की अनुशासनात्मक व्यवस्था का व्यापक प्रदर्शन ऑडिट कराए।
जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वकालत का पेशा स्व-नियमन का विशेषाधिकार रखता है, इसलिए इसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत प्रभावशीलता भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
अदालत ने वकीलों के लिए निरंतर विधिक शिक्षा की आवश्यकता पर भी बल दिया और कहा कि बीसीआई एक समिति गठित कर अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण और अनुशासन संबंधी अपनी स्व-नियामक व्यवस्था का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करासमिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद बीसीआई को उठाए गए या प्रस्तावित कदमों का हलफनामा भी अदालत में दाखिल करना होगा।
यह निर्देश अदालत ने वकील अजय विज की अपील स्वीकार करते हुए दिया। अजय विज का नाम कथित लापरवाहीपूर्ण कानूनी राय देने के आरोप में भारतीय बैंक संघ की 'सावधानी सूची' में शामिल किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उनका नाम इस सूची से हटाने का आदेश दिया और इसी दौरान वकालत के पेशे में जवाबदेही और पेशेवर मानकों को मजबूत करने पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
अदालत ने कहा कि वर्षों से अनुशासनात्मक मामलों के लंबित रहने, प्रक्रियागत देरी, अलग-अलग बार काउंसिलों में अलग-अलग कार्यप्रणाली और मामलों की प्रगति व परिणाम संबंधी जानकारी के अभाव जैसी चिंताएं सामने आती रही हैं। यद्यपि कानूनी ढांचा सुविचारित है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि मौजूदा व्यवस्था व्यवहार में अपने उद्देश्य पूरे कर रही है या नहीं।
इसी उद्देश्य से अदालत ने ऑडिट के दौरान कई पहलुओं की समीक्षा करने का सुझाव दिया। इनमें प्रत्येक राज्य बार काउंसिल में हर वर्ष दर्ज होने वाली शिकायतों की संख्या, उनके निस्तारण की संख्या, मामलों के निपटारे में लगने वाला औसत समय, लंबित मामलों की अवधि, विभिन्न राज्यों में निस्तारण की स्थिति, अपनाई जा रही प्रक्रियाएं, कर्मचारियों और प्रशासनिक संसाधनों की उपलब्धता, दिए गए दंड, अनुशासनात्मक कार्यवाही की पारदर्शिता तथा वैधानिक समय-सीमा के पालन जैसे बिंदु शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि समिति में केवल बार काउंसिल के प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि वादकारियों के प्रतिनिधि, लोक प्रशासन के विशेषज्ञ, आंकड़ों के विश्लेषण से जुड़े विशेषज्ञ और संस्थागत सुधार का अनुभव रखने वाले लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
अदालत के अनुसार, विविध प्रतिनिधित्व से मूल्यांकन अधिक निष्पक्ष और प्रभावी होगा तथा संस्थागत कमियों की सही पहचान हो सकेगी।
पीठ ने कहा,
"इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी पर दोषारोपण करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की मजबूतियों और कमजोरियों की पहचान करना है। सुधार का आधार तथ्यों पर होना चाहिए, ताकि अनुशासनात्मक व्यवस्था अधिक प्रभावी बने और निष्पक्षता तथा पेशेवर स्वतंत्रता भी बनी रहे।"
अदालत ने कहा कि वकालत का पेशा सीधे तौर पर न्याय तक लोगों की पहुंच और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास से जुड़ा है। इसलिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इसकी नियामक व्यवस्था भी जवाबदेही के आधुनिक मानकों पर खरी उतरे।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI को निर्देश दिया कि समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद उठाए गए या प्रस्तावित कदमों का विवरण हलफनामे के माध्यम से अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
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