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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने याद किया अमर प्रेम का समय, बताया जस्टिस गवई की विशिष्टता

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि जब उन्हें और बीआर गवई साथ पर नियमित रूप से बेंच पर बैठते थे, तो उन्हें प्यार से 'अमर प्रेम' कहा जाता था। उन्होंने कहा कि जस्टिस गवई का मिलनसार स्वभाव और अच्छा स्वभाव हुआ करता था और सभी को उनकी बात सुनने का मौका मिलता था।

14 जुलाई 2026 को 06:13 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने याद किया अमर प्रेम का समय, बताया जस्टिस गवई की विशिष्टता

सौजन्य से:- Jansatta

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने मंगलवार को याद किया कि जब वे और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई बेंच पर नियमित रूप से बेंच पर बैठते थे, तो उन्हें बॉलीवुड की मशहूर फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ के नाम पर प्यार से अमर प्रेम कहा जाता था।

जस्टिस नाथ ने जस्टिस गवई की किताब ‘द वॉयस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स’ के लॉन्च के मौके पर यह बात कही। जस्टिस नाथ ने उस समय को प्यार से याद किया जब वे और जस्टिस गवई अक्सर बेंच पर साथ बैठते थे। उन्होंने बताया कि बार के सदस्यों ने उन्हें प्यार से एक यादगार निकनेम दिया था।

वो बहुत यादगार दिन थे- जस्टिस विक्रम नाथ

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “आप में से कई लोगों को वह समय याद होगा जब हम (जस्टिस नाथ और जस्टिस गवई) बेंच पार्टनर के तौर पर साथ बैठते थे। वे सचमुच यादगार दिन थे और आज भी मैं बार के सदस्यों को उन दिनों को बहुत प्यार से याद करते हुए सुनता हूं।”

हमें प्यार से अमर प्रेम नाम दिया गया था- जस्टिस विक्रम नाथ

उन्होंने आगे कहा कि जस्टिस गवई के साथ उनकी दोस्ती और तालमेल उनके सामने पेश होने वाले वकीलों की नजर से छिपा नहीं था। उन्होंने कहा, “हमें प्यार से ‘अमर प्रेम’ नाम दिया गया था, जो मशहूर फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ से लिया गया था। यह सब मजाक-मजाक में हुआ था और मैं मानता हूं कि हमें यह नाम काफी पसंद आया था।”

जस्टिस नाथ ने आगे कहा कि यह निकनेम जस्टिस गवई के व्यक्तित्व और न्यायिक काम की गंभीरता को बनाए रखते हुए लोगों को सहज महसूस कराने की उनकी क्षमता को दर्शाता है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “चाहे कोर्टरूम हो या उसके बाहर, उनमें किसी भी स्थिति में सहजता लाने की काबिलियत है, बिना उसकी गंभीरता को कम किए।”

जस्टिस नाथ के अनुसार, जस्टिस गवई के मिलनसार स्वभाव और अच्छे स्वभाव की वजह से हर किसी को अपना पहला केस लड़ रहे युवा वकीलों से लेकर बार के सीनियर सदस्यों तक यह महसूस होता था कि उनकी बात सुनी जा रही है। उन्होंने कहा, “कोर्टरूम अक्सर डरावनी जगह हो सकती है, लेकिन उनकी हाजिरजवाबी और सहज स्वभाव ने सभी को याद दिलाया कि शालीनता और दयालुता, सख्ती या अनुशासन के खिलाफ नहीं हैं।”

किताब का लंबे समय से था इंतजार

जस्टिस नाथ ने कहा कि यह किताब सही समय पर आई है और इसका लंबे समय से इंतजार था क्योंकि इसमें एक ऐसे जज के विचार और सोच को शामिल किया गया है, जिनके सार्वजनिक भाषणों में वही संवैधानिक मूल्य झलकते थे जो उनके न्यायिक कामकाज का आधार थे।

उन्होंने कहा कि जहां अदालती फैसले कानून की अनुशासित भाषा में होते हैं, वहीं भाषण अक्सर किसी जज के मूल्यों, संस्थागत विश्वासों और समाज के प्रति उनके नजरिये के बारे में बहुत कुछ बताते हैं। जस्टिस नाथ ने कहा, “वे हमें जज के बारे में, उनके मूल्यों, जिन संस्थाओं में वे विश्वास करते हैं और जिस समाज को बनाने में वे मदद करना चाहते हैं, उसके बारे में बहुत कुछ बताते हैं।”

यह भी पढ़ें: ‘जहां सुरक्षा का प्रश्न उठे, वहां राष्ट्र प्रधान रहे’, हाई कोर्ट ने भारत-पाक बॉर्डर पर मस्जिदें हटाने के खिलाफ याचिका की खारिज

राजस्थान हाई कोर्ट ने भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस और बेदखली नोटिस को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है और धार्मिक भेदभाव का मामला नहीं है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…

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