हाई कोर्ट ने कहा- मुकदमे के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करना उचित नहीं, त्वरित न्याय पर ध्यान देना है
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि देशभर की अदालतों में मामलों का भारी बोझ होने के कारण किसी भी मुकदमे के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करना न तो उचित है और न ही इसकी आवश्यकता। अदालत ने कहा कि लंबित मामलों की संख्या अदालतों की जिम्मेदारी को कम नहीं करती और जरूरी मामलों की सुनवाई यथासंभव शीघ्र की जानी चाहिए।

सौजन्य से:- Jagran
धोखाधड़ी के मामले में जल्द सुनवाई का निर्देश, हाई कोर्ट ने कहा- 'समय-सीमा नहीं, त्वरित न्याय पर हो ध्यान'
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा है कि मुकदमों के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करना उचित नहीं, लेकिन अदालतों को त्वरित सुनवाई के ठोस प्रयास करने चाहि ...और पढ़ें
HighLights
- मुकदमे के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करना उचित नहीं।
- अदालतों को लंबित मामलों में त्वरित सुनवाई के प्रयास करने होंगे।
- न्याय केवल होना ही नहीं, बल्कि होता हुआ भी दिखना चाहिए।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि देशभर की अदालतों में मामलों का भारी बोझ होने के कारण किसी भी मुकदमे के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करने का निर्देश देना न तो उचित है और न ही इसकी आवश्यकता है।
हालांकि अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि लंबित मामलों का दबाव अदालतों के दायित्व को कम नहीं कर सकता कि वे जरूरी मामलों की सुनवाई यथासंभव शीघ्र करें। यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम अग्रवाल ने गुरुग्राम सदर थाना में 21 अप्रैल 2017 को दर्ज धोखाधड़ी के मामले में सुनवाई के दौरान की।
याचिका में भारतीय दंड संहिता की धारा 420 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(बी) के तहत दर्ज एफआइआर को रद करने की मांग के साथ-साथ ट्रायल को समयबद्ध तरीके से पूरा कराने का निर्देश देने की भी प्रार्थना की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि एफआइआर वर्ष 2017 में दर्ज हुई थी, जबकि अंतिम रिपोर्ट 5 मार्च 2020 को दाखिल कर दी गई थी। इसके बावजूद मुकदमे का ट्रायल आगे नहीं बढ़ सका। वकील ने दलील दी कि मामले में कई बार स्थगन दिया गया।
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चार्जशीट में मौजूद अस्पष्ट तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए ट्रायल कोर्ट ने जांच अधिकारी को तलब किया, लेकिन वह लगातार अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। जांच अधिकारी के इस रवैये के कारण अनावश्यक देरी हुई और इससे याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान उठाना पड़ा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस विक्रम अग्रवाल ने कहा, “यह अदालत इस तथ्य से पूरी तरह अवगत है कि अदालतें बड़ी संख्या में लंबित मामलों के बोझ से दबी हुई हैं और ऐसे में मामलों के समयबद्ध निस्तारण का निर्देश देना न तो उचित है और न ही आवश्यक है।”
साथ ही स्पष्ट किया कि लंबित मामलों की संख्या अदालतों की जिम्मेदारी को कम नहीं करती। जस्टिस अग्रवाल ने अपने आदेश में कहा कि “यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि प्रत्येक मुकदमे में पक्षकारों के महत्वपूर्ण अधिकार जुड़े होते हैं और प्रत्येक अदालत का यह कर्तव्य है कि वह जरूरी मामलों का यथासंभव शीघ्र निस्तारण करे। कहा जाता है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।”
मामले का निस्तारण करते हुए हाई कोर्ट ने संबंधित ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मुकदमे का जल्द से जल्द फैसला करने के लिए “ठोस और समन्वित प्रयास” करे। अदालत ने विशेष रूप से इस तथ्य का उल्लेख किया कि एफआइआर वर्ष 2017 में दर्ज हुई, अंतिम रिपोर्ट 5 मार्च 2020 को दाखिल हुई, जबकि आरोप वर्ष 2026 में तय किए गए हैं। ऐसे में ट्रायल को अनावश्यक रूप से लंबित रखना न्यायहित में नहीं होगा।
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