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सुप्रीम कोर्ट के दिशा‑निर्देश: फर्जी FIR रद्द करने में हाईकोर्ट की विशिष्ट शक्ति

FIR दर्ज होने से ही आरोपी को दोषी नहीं माना जाता; यदि आरोप संज्ञेय अपराध नहीं बनाते या प्रक्रिया का दुरुपयोग दिखे, तो BNSS धारा 528 के तहत हाईकोर्ट उसे रद्द कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सात स्थितियों को रेखांकित किया है जहाँ उच्च न्यायालय अंतर्निहित शक्ति प्रयोग कर सकता है, जबकि केवल "FIR झूठी है" कहना पर्याप्त नहीं है।

27 सितंबर 2026 को 05:04 am बजे
सुप्रीम कोर्ट के दिशा‑निर्देश: फर्जी FIR रद्द करने में हाईकोर्ट की विशिष्ट शक्ति

सौजन्य से:- Navbharat Times

ऐसी FIR जो आपराधिक कार्यवाही दुर्भावना से शुरू की गई है, तो कानून ही FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द कराने का रास्ता देता है। लेकिन हर FIR को केवल आरोपी के उसे फर्जी बताने से रद्द नहीं किया जाता।

नई दिल्ली : FIR दर्ज होने से ही, आरोपी को दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जांच के दौरान आरोपों की सत्यता अलग-अलग साक्ष्यों से परखी जाती है। लेकिन यदि FIR को उसके मूल रूप में पढ़ने पर भी कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता या पूरी कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग दिखाई देती है, तो कानून से मिले उपाय के तहत हाईकोर्ट अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 528 हाईकोर्ट को ऐसी आवश्यक कार्यवाही करने की शक्ति देती है जो न्याय के उद्देश्य पूरे करने या अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए जरूरी हो।

हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां और BNSS की धारा 528

इसे ऐसे भी जान सकते हैं कि फर्जी FIR रद्द कराने के लिए कौन सी धारा लागू होती है। ऐसे मामलों में दरअसल भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS की धारा 528 हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां के बारे में बताती है। इसका उद्देश्य अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना और न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करना है। पुरानी CrPC में इसी तरह की शक्ति धारा 482 में थी और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि BNSS धारा 528 उसी प्रकृति की शक्ति है।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एफआईआर रद्द की कार्यवाही में सामान्यतः अदालत को सबूतों की विश्वसनीयता पर विस्तृत जांच करके मिनि ट्रायल नहीं करना चाहिए। याचिका में केवल FIR फर्जी है लिखने के बजाय ऐसे ठोस कानूनी आधार और दस्तावेज रखने महत्वपूर्ण होते हैं जो आरोपों की कानूनी कमी दिखाते हों।

याचिका में केवल FIR फर्जी है लिखने से नहीं चलेगा काम

सुप्रीम कोर्ट की गाईडलाइन क्या है

सुप्रीम कोर्ट के State of Haryana v. Bhajan Lal फैसले में ऐसी सात परिस्थितियों के उदाहरण दिए गए हैं जिनमें हाईकोर्ट अंतर्निहित शक्तियां का इस्तेमाल कर सकता है। इनमें FIR के आरोपों से प्रथम दृष्टया कोई अपराध न बनना, संज्ञेय अपराध का खुलासा न होना और आरोपों का इतना असंभव या बेतुका होना शामिल है कि उनके आधार पर आगे कार्यवाही का पर्याप्त आधार न हो। कानून में स्पष्ट रोक होने या कार्यवाही के दुर्भावनापूर्ण तरीके से निजी बदले के लिए शुरू किए जाने जैसी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

अदालत केवल इसलिए FIR रद्द नहीं करती कि आरोपी ने आरोपों को झूठा बताया है। हाईकोर्ट को यह देखना होता है कि FIR और उपलब्ध सामग्री को प्रथम दृष्टया देखने पर अपराध के आवश्यक तत्व सामने आते हैं या नहीं।

सिर्फ यह कहना कि FIR झूठी है, पर्याप्त नहीं

FIR में जरूरी तथ्य या अपराध के तत्व हैं या नहीं , देखना जरूरी

यदि FIR में लगाए गए आरोपों को सही मानकर भी संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते, तो यह रद्द का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के एक फैसले में भी दोहराया कि FIR कोई पूरी केस डायरी नहीं होती, लेकिन उसमें कथित संज्ञेय अपराध से जुड़े बुनियादी तथ्य और आरोप होने चाहिए।

अत्यधिक अस्पष्ट आरोपों या आवश्यक particulars के अभाव की स्थिति में हाईकोर्ट धारा 528 BNSS के तहत मामले की जांच कर सकता है।

हालांकि यह जांच इस सीमा तक होती है कि आरोप कानूनी तौर पर अपराध का प्रथम दृष्टया गठन करते हैं या नहीं, न कि पूरा मुकदमा ट्रायल की तरह चलाया जाए।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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