गर्भवती IPS अधिकारियों को प्रशिक्षण से रोकने वाले नियम पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
गर्भवती महिला IPS अधिकारियों को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है यह याचिका, जिसमें कहा गया है कि प्रशिक्षण से रोकने का फैसला आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होना चाहिए।

सौजन्य से:- ndtv.in
गर्भवती महिला IPS अधिकारियों को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (OM) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. चुनौती देने वाली एक महिला IPS ही हैं. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच आज इसकी सुनवाई करेगी. याचिका में कहा गया है कि आज के समय में ऐसे फैसले पुराने नियमों के बजाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होने चाहिए. यह याचिका मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है. उर्वशी सेंगर ने नवंबर 2023 में फेज-1 प्रशिक्षण शुरू किया था. अप्रैल 2025 में फेज-2 प्रशिक्षण के दौरान वह गर्भवती हुईं और इसकी जानकारी अकादमी को दी. इसके बाद उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने और प्रसव के एक साल बाद अगली बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने के लिए कहा गया.
सितंबर 2025 में बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर फेज-2 प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने 1993 के नियम का हवाला देकर उनकी मांग ठुकरा दी.
उर्वशी सेंगर ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) का रुख किया. 27 मई को CAT ने अंतरिम आदेश में उन्हें आवश्यक मेडिकल औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर फेज-2 प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दे दी थी हालांकि बाद में पुलिस अकादमी ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी. हाईकोर्ट ने 22 जून को CAT के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि यह नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया था.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि 1993 का नियम सभी गर्भवती अधिकारियों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से लागू होता है . इसमें फेज-1 और फेज-2 प्रशिक्षण के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है . फेज-2 में मुख्य रूप से कक्षा आधारित पढ़ाई, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण होता है, जो शारीरिक रूप से अत्यधिक कठिन नहीं है. इसलिए केवल गर्भावस्था के आधार पर प्रशिक्षण से बाहर करना उचित नहीं है. याचिका में यह भी कहा गया है कि किसी अधिकारी की व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए, न कि सभी पर एक जैसा प्रतिबंध लगाया जाए .
उर्वशी सेंगर ने अपनी याचिका में बताया कि 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने महिला IAS अधिकारियों के लिए पुराने नियम में संशोधन किया था अब IAS महिला प्रोबेशनरों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति दी जाती है. याचिका में कहा गया है कि IPS अधिकारियों के लिए अब भी 1993 का पुराना नियम लागू रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है.
अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि क्या केवल गर्भवती होने के आधार पर किसी महिला IPS अधिकारी को प्रशिक्षण से बाहर किया जा सकता है? या फिर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, व्यक्तिगत मेडिकल जांच और प्रशिक्षण की प्रकृति को देखते हुए हर मामले में अलग-अलग फैसला लिया जाना चाहिए?
दरअसल 23 अगस्त 1993 को जारी गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन में कहा गया था कि महिला IPS प्रोबेशनर प्रशिक्षण के दौरान गर्भधारण से बचें . यदि कोई अधिकारी प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है, तो उसकी ट्रेनिंग तुरंत रोक दी जाएगी . वह प्रसव के एक साल बाद ही प्रशिक्षण दोबारा शुरू कर सकेगी . इस अवधि को असाधारण अवकाश माना जाएगा, हालांकि उसकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी.
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