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नाबालिग शादी में पर्सनल लॉ बनाम POCSO: हाईकोर्ट ने यौन अपराध की जिम्मेदारी बरकरार रखी

दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 वर्षीय व्यक्ति द्वारा 16 साल की लड़की से हुई शादी को पर्सनल लॉ के हवाले से बचाव के बावजूद POCSO के तहत यौन अपराध माना। इसी तरह के निर्णय केरल, पंजाब और हरियाणा के हाईकोर्टों ने भी दिए हैं, जहाँ 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को 'child' माना जाता है। यह संघर्ष व्यक्तिगत कानून की वैधता और बाल संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को उजागर करता है।

27 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
नाबालिग शादी में पर्सनल लॉ बनाम POCSO: हाईकोर्ट ने यौन अपराध की जिम्मेदारी बरकरार रखी

सौजन्य से:- Navbharat Times

दिल्ली हाईकोर्ट का मामला?

28 वर्षीय शख्स ने 16 साल 3 महीने की लड़की से शादी की थी। दंपती ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देते हुए FIR रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी पर्सनल लॉ के तहत विवाह का दावा होने भर से 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध पर POCSO की आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

कई दूसरे हाईकोर्ट ने भी दिए हैं ऐसे फैसले

केरल हाईकोर्ट ने पिछले महीने कहा था कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबध POCSO के दायरे में आएगा। 18 साल से कम उम्र का शख्स 'child' है। इसका उद्देश्य बच्चे को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है। 2022 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम लड़की को प्यूबर्टी प्राप्त करने के बाद पसंद के शख्स से शादी में संरक्षण दिया था।

शादी की उम्र को लेकर पर्सनल लॉ?

हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत होने वाली शादी में 18 साल से कम उम्र में शादी होती है तो भी वह अमान्य नहीं है बल्कि अमान्य करार दिए जाने योग्य है। ऐसी शादी के बाद जब लड़की बालिग हो जाए तो वह इसे अमान्य घोषित करने के लिए आवेदन दे सकती है। वहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत जब लड़की प्यूबर्टी पा लेती है तो शादी हो सकती है।

पोक्सो कानून ?

18 साल से कम उम्र के बच्चों से सेक्शुअल नेचर का अपराध पॉक्सो के दायरे में आता है। इसमें यौन अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इसकी धारा-3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट और धारा-7 के तहत सेक्शुअल असॉल्ट को परिभाषित किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने एक दूसरा सवाल

जुलाई 2026 में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने किशोरों की privacy से जुड़े मामले में POCSO के संभावित दुरुपयोग पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि अगर 15-18 वर्ष की उम्र के लड़का-लड़की स्वेच्छा से संबंध में हैं और घर से चले जाते है तो राज्य उन्हें कैसे रोक सकता है। कई मामलों में परिवार 'सम्मान' के नाम पर आपराधिक कानून का सहारा लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की कानूनी सहमति को मान्यता दे दी है।

क्या कानून में बदलाव की जरूरत है?

एक तरफ POCSO का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है। दूसरी तरफ ऐसे मामले भी सामने आते हैं जहां किशोर प्रेम संबंध, घर से भागना, शादी और बाद में दर्ज POCSO मुकदमे एक-दूसरे से जुड़ जाते है। कानून के सामने चुनौती यही है कि 15 साल से कम उम्र के बच्चे की सुरक्षा कमजोर किए बिना मामले को कैसे देखा जाए।

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