सुप्रीम कोर्ट ने कहा - एआई के खतरनाक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए हमारी निगरानी जरूरी है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एआई से होने वाली उथल-पुथल एक ज्ञात अज्ञात है, और इंसानी बेवकूफी और सोची-समझी साजिश के मेल से एआई के खतरनाक सामाजिक नतीजे सामने आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अदालत के सामने गढ़े हुए, मशीन से जेनरेट किये हुए फैसले पेश करना वकीलों के लिए पेशेवर कदाचार और जजों के लिए कर्तव्य में गंभीर चूक है।

सौजन्य से:- The Hindu
अगर इसका कोई गंभीर नतीजा न होता, तो एक जज का कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के मतिभ्रमों के आधार पर किसी न्यायिक फैसले पर पहुंचना मजेदार बात होती। न्यायिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किये जाने पर, ऐसों मतिभ्रमों से न्याय करने में जो गंभीर गड़बड़ी हो सकती है उसे देखते हुए, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इसकी तुलना मिथाइल आइसोसाइनेट से की, वह जहरीली गैस जिसकी वजह से सन 1984 में भोपाल गैस त्रासदी हुई — “अदृश्य, चुपचाप फैलने वाली और किसी को पता चलने तक विनाशकारी रूप ले लेने वाली”। सुप्रीम कोर्ट ने दिवालियापन के एक मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के आदेशों को दरकिनार करते हुए ये टिप्पणियां कीं। उसने पाया कि एनसीएलटी ने एआई-निर्मित काल्पनिक कानूनी उद्धरणों पर भरोसा किया था, और अपीलेट ट्रिब्यूनल ने इस चूक पर ध्यान नहीं दिया। यह इस साल सुप्रीम कोर्ट की ओर से किये गये उन कई हस्तक्षेपों में से एक है, जिनमें अदालती कार्यवाहियों में एआई-निर्मित काल्पनिक न्यायिक नजीरों के इस्तेमाल के खिलाफ आगाह किया गया। अपने फैसलों और मौखिक टिप्पणियों के जरिए, सुप्रीम कोर्ट ने न्याय देने की व्यवस्था में एआई का इस्तेमाल किये जाने को लेकर लगातार सख्त और सतर्क रवैया अपनाया है। अभी, 27 फरवरी को, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की इसी पीठ ने एक निचली अदालत द्वारा एआई-निर्मित नजीर कानूनों (केस लॉ) पर भरोसा करने का संज्ञान लिया और रेखांकित किया कि यह “फैसला लेने में हुई त्रुटि” भर नहीं थी, बल्कि न्यायिक “कदाचार” के बराबर था।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एआई कार्यकुशलता बढ़ाने में एक सहायक औजार के रूप में काम कर सकता है, लेकिन यह कभी स्वतंत्र मानवीय तर्कशक्ति, न्यायिक विवेक या पेशेवर जवाबदेही की जगह नहीं ले सकता। एआई के मामले में, इंसानियत का सामना एक ऐसी चीज से हो रहा है, जिसके बारे में कई विशेषज्ञों को डर है कि यह अस्तित्व से जुड़ा सवाल हो सकता है। एआई से होने वाली उथल-पुथल एक ज्ञात अज्ञात है – हर कोई जानता है कि यह हो रहा है, लेकिन किसी को भी इसकी सीमा या परिणाम का ठीक-ठीक नहीं पता। हालांकि, इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि इंसानी बेवकूफी और सोची-समझी साजिश के मेल से एआई के खतरनाक सामाजिक नतीजे सामने आ रहे हैं। इन खतरों की जरूरी काट इंसानी निगरानी
है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अदालत के सामने गढ़े हुए, मशीन से जेनरेट किये हुए फैसले पेश करना वकीलों के लिए पेशेवर कदाचार और जजों के लिए कर्तव्य में गंभीर चूक है; और नकली या मतिभ्रमित एआई सामग्री के लेशमात्र से भी प्रभावित कोई फैसला “कानून की नजर में कोई निर्णय नहीं” है। ‘अदालतों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग के लिए विनियम, 2026’ का मसौदा न्यायिक परिणाम वाले कामों जैसे न्यायिक-निर्णय करने, सजा निर्धारित करने, या जमानत की पात्रता तय करने और पक्षों या गवाहों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन करने में एआई को निषिद्ध करता है। अब जबकि यह मसौदा सार्वजनिक सलाह-मशविरे के लिए खुला है, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को एक समर्पित कमेटी गठित करने का निर्देश दिया है जो कड़े मानदंड बनायेगी और असत्यापित एआई सामग्री का हवाला देने वाले वकीलों के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को परिभाषित करेगी। न्याय हो और दिखे; वह मतिभ्रम का शिकार न बने।
Published - July 04, 2026 10:36 am IST
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