सुप्रीम कोर्ट में धर्म और अभिव्यक्ति की सीमाएं: 'महाप्रभु जगन्नाथ' फिल्म पर विवाद
ओड़िया सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ: द बिगिनिंग' की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की है, जिससे यह सवाल उठता है कि धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच क्या सीमाएं हैं।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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दरअसल व्यावसायिक नजरिए से बनी यह फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ: द बिगिनिंग', भगवान जगन्नाथ से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं और धार्मिक इतिहास का चित्रण प्रामाणिक पक्ष नहीं दिखाती है। ऐसा ओडिशा सरकार का मानना है। फिल्म की रिलीज से पहले इसके ट्रेलर और प्रचार सामग्री पर भी आपत्ति जताई गई थी। राज्य का दावा है कि इससे श्रद्धालुओं की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। मामले में पहले हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन राहत नहीं मिलने पर राज्य सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सर्वोच्च अदालत में राज्य ने फिल्म की रिलीज पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया कि क्या किसी फिल्म के प्रदर्शन से वास्तव में भगवान जगन्नाथ के प्रति लोगों की आस्था कम हो जाएगी। यही प्रश्न इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।क्या मुसलमानों को UCC से बाहर रखने की मांग जायज है? जानिए संविधान, अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट का कानूनी नजरिया
फिल्म पर रोक लगाने की मांग और राज्य सरकार का पक्ष
- राज्य सरकार का कहना है कि भगवान जगन्नाथ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं।
- यदि किसी फिल्म में धार्मिक तथ्यों को विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो यह सार्वजनिक व्यवस्था और धार्मिक सौहार्द पर प्रभाव डाल सकता है।
- सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 25 और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी का हवाला दिया।
- इसके साथ ही राज्य ने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं के गलत चित्रण से सामाजिक तनाव पैदा होने की आशंका रहती है।
- सरकार का तर्क है कि अदालत को एहतियाती दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसलिए फिल्म की रिलीज पर अंतिम निर्णय तक रोक लगाना आवश्यक है।
- राज्य सरकार की दलीलें धार्मिक अधिकारों, प्रशासनिक व्यवस्था और सार्वजनिक हित पर आधारित है।
फिल्म निर्माताओं का पक्ष क्या है?
- फिल्म निर्माता और उनके वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि फिल्म किसी धर्म का अपमान करने के उद्देश्य से नहीं बनाई गई है।
- उनके अनुसार यह महज सिनेमाई प्रस्तुति है, जिसमें रचनात्मक स्वतंत्रता का उपयोग किया गया है। निर्माताओं ने अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया।
- उनका कहना है कि किसी कलात्मक प्रस्तुति को केवल आशंकाओं के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यदि फिल्म को पहले ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड CBFC से प्रमाणन मिल चुका है, तो उसकी रिलीज रोकने के लिए ठोस कानूनी आधार होना चाहिए।
- निर्माताओं ने अदालत से कहा कि दर्शकों को स्वयं तय करने दिया जाए कि वे फिल्म देखना चाहते हैं या नहीं। उनका दावा है कि यह फिल्म धार्मिक श्रद्धा को बढ़ाने का प्रयास है, न कि उसे कम करने का।
धार्मिक आस्था बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: कानूनी सिद्धांत
भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देता है। पर यह आजादी असीमित नहीं हैं। अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन उनका आधार कानून होना चाहिए। दूसरी ओर अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म का पालन और प्रचार करने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि किसी रचनात्मक कृति पर प्रतिबंध लगाने के लिए वास्तविक और स्पष्ट खतरे का प्रमाण जरूरी होता है। केवल किसी समूह की असहमति अपने आप में सेंसरशिप का आधार नहीं बनती।मंदिरों में VIP दर्शन खत्म होगा क्या, भगवान के सामने सब बराबर, हाईकोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस
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