सुप्रीम कोर्ट ने बिसनबहादुर कार्की की उम्रकैद को घटा कर केवल 3 साल की जेल की सजा दी
जबरन रेप के मामले में जिला अदालत से उम्रकैद की सजा पाई बिसनबहादुर कार्की को उच्च न्यायालय की 12 साल की सजा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की जेल की सजा सुनाई। कोर्ट ने अपराध को ‘जबरन रेप’ से बदलकर बाल यौन शोषण माना और उच्च न्यायालय के निर्णय को भी आंशिक रूप से उलटा।

सौजन्य से:- Ratopati
काठमांडू। जबरन रेप से जुड़े एक मामले में जिला अदालत से उम्रकैद की सजा पाने वाले एक व्यक्ति की सजा सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने पर घटकर केवल तीन साल की कैद होने का फैसला आया है। प्रतिवादी बिसनबहादुर कार्की के खिलाफ जबरन रेप के मामले में जिला अदालत से उम्रकैद की सजा हुई थी और जिला अदालत के फैसले के खिलाफ हुई अपील पर हाई कोर्ट से 12 साल 6 महीने की कैद की सजा तय की गई थी।
उक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कार्की को हाई कोर्ट से हुई 12 साल 3 महीने की कैद की सजा को घटाते हुए केवल 3 साल कैद होने का फैसला किया है। न्यायाधीशद्वय महेश शर्मा पौडेल और शांतिसिंह थापा की संयुक्त बेंच ने बिसनबहादुर सार्की की अपील पर यह फैसला किया है।
बिसनबहादुर सार्की पर मुलुकी अपराध संहिता, 2074 की धारा 219 की उपधारा (1) के अपराध में उसी धारा की उपधारा (3) के खंड (क) के मुताबिक सजा का अभियोग माँग दाबी किया गया था। बागलुङ जिला अदालत ने 2078 मंसिर 26 को अभियोग माँग दाबी के मुताबिक ही प्रतिवादी को उम्रकैद और 6 लाख जुर्माना होने का फैसला किया था।
जिला अदालत के फैसले के खिलाफ पड़ी अपील पर हाई कोर्ट पोखरा, बागलुङ बेंच ने 2079 भदौ 15 को शुरुआती फैसले को आंशिक रूप से पलटते हुए जबरन रेप की जगह 'जबरन रेप के प्रयास' (प्रयास) का अपराध तय किया था। हाई कोर्ट ने प्रतिवादी को 12 वर्ष 6 महीने कैद, और 3 लाख रुपये जुर्माना और मुआवजा भरने का फैसला सुनाया था।
हाई कोर्ट के फैसले से संतुष्ट न होने के बाद बिसनबहादुर सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट का फैसला भी पूरी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। प्रतिवादी द्वारा अधिकार प्राप्त अधिकारी और अदालत में अपने ऊपर लगे जबरन रेप के अपराध से इनकार करने के तथ्य को सुप्रीम कोर्ट ने आधार माना है।
साथ ही, पीड़िता को जाँघ पर पकड़ते समय उँगली से गुप्तांग को छूने के तथ्य को स्वीकार करने और पीड़िता की स्वास्थ्य परीक्षण रिपोर्ट से उसके शरीर तथा गुप्तांग में कोई घाव चोट न दिखने पर भी मिसिल में संलग्न प्रमाण के आधार पर पीड़िता के साथ प्रतिवादी द्वारा बाल यौन शोषण का अपराध करने की बात स्थापित होने का फैसला किया है।
इसी प्रमाण के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जबरन रेप न मानकर बाल यौन शोषण होना तय किया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालत के शुरुआती फैसले और हाई कोर्ट के फैसले के बीच के अंतर की भी समीक्षा की है।
जिला अदालत ने जबरन रेप तय किया था। हाई कोर्ट ने उसे आंशिक रूप से बदलते हुए जबरन रेप का प्रयास तय किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों से अलग निष्कर्ष निकालते हुए बाल यौन शोषण का अपराध कायम किया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक बिसनबहादुर 2077 साल मङ्सिर 24 तारीख से जेल में बंद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की कैद होने का फैसला सुनाते हुए यह भी उल्लेख किया है कि आदेश आने तक उनकी सजा पूरी हो चुकी है।
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