शिवसेना के नाम-सिंबल विवाद पर सुनवाई: 'एक नेता पूरी पार्टी नहीं'
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना से जुड़े मामले पर सुनवाई शुरू हुई, उद्धव गुट के वकील कपिल सिब्बल ने दलीलें दीं और कहा कि एकनाथ शिंदे को पार्टी का सदस्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि उन्होंने पार्टी के खिलाफ काम किया है और यह दल-बदल विरोधी कानून के भावना के खिलाफ हो रहा है

सौजन्य से:- AajTak
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सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को शिवसेना से जुड़े अहम मामले पर सुनवाई शुरू हुई. इस दौरान उद्धव गुट के वकील के तौर पर कपिल सिब्बल ने दलीलें दीं और कहा कि, एकनाथ शिंदे साल 2019 में उद्धव ठाकरे की ही सरकार में मंत्री बने थे.
उन्होंने कहा- आज कल यह टेंडेसी आम होती जा रही है कि नेता एक चुनाव चिह्न पर जीतते हैं और बाद में किसी दूसरे दल या गुट का सदस्य होने का दावा करने लगते हैं. इसका संसदीय लोकतंत्र पर गंभीर असर पड़ता है. सिब्बल ने कहा कि अगर इस याचिका पर समय रहते सुनवाई हो जाती, तो शिंदे सरकार का गठन नहीं हो पाता.
सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सुना और अगली सुनवाई के लिए चार अगस्त, मंगलवार की तारीख दी है.
साल 2018 में उद्धव की लीडरशिप में एकनाथ शिंदे ने लड़ा था चुनाव
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें रखते हुए कहा कि बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभाली और इसे आगे बढ़ाया. साल 2018 में पार्टी ने उनकी लीडरशिप में इलेक्शन लड़ा और 2019 में एकनाथ शिंदे भी शिवसेना के सदस्य के रूप में मंत्री बने.
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कपिल सिब्बल ने कहा कि बाद में विधान परिषद चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग हुई, जिससे पार्टी को संदेह हुआ कि एकनाथ शिंदे गुट कोई अलग रणनीति पर काम कर रहा है. इसके कुछ समय बाद अचानक 31 विधायक गुवाहाटी चले गए.
वहां इन विधायकों ने प्रस्ताव पारित कर पार्टी के तत्कालीन मुख्य सचेतक (व्हिप) सुनील प्रभु को हटाने और भरत गोगावले को नया व्हिप नियुक्त करने का फैसला किया. सिब्बल ने जोर देकर कहा कि यह प्रस्ताव केवल उन्हीं 31 विधायकों ने पारित किया था, पूरी पार्टी ने नहीं.
उन्होंने बताया कि यह पत्र विधानसभा अध्यक्ष को भेजा गया, जिसके बाद अध्यक्ष ने इसे राज्यपाल के पास भेज दिया. इसके तुरंत बाद राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दे दिया. सिब्बल ने कहा कि उस समय उद्धव ठाकरे ही पार्टी प्रमुख (पंच प्रमुख) थे, इसलिए केवल विधायक यह दावा नहीं कर सकते कि वही पूरी राजनीतिक पार्टी हैं. सिब्बल ने अदालत के सामने सवाल उठाया कि क्या केवल विधानमंडल दल के सदस्य खुद को पूरी पार्टी घोषित कर सकते हैं?
दल-बदल विरोधी कानून के भावना के खिलाफ हो रहा काम
उन्होंने कहा कि यह दल-बदल विरोधी कानून की भावना के खिलाफ है. उन्होंने दलील दी कि अगर किसी जनप्रतिनिधि का आचरण यह दिखाता है कि उसने खुद की इच्छा से अपनी पार्टी की मेंबरशिप छोड़ दी है, तो उसे दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि आजकल यह टेंडेसी आम होती जा रही है कि नेता एक चुनाव चिह्न पर जीतते हैं और बाद में किसी दूसरे दल या गुट का सदस्य होने का दावा करने लगते हैं. इसका संसदीय लोकतंत्र पर गंभीर असर पड़ता है. सिब्बल ने कहा कि अगर इस याचिका पर समय रहते सुनवाई हो जाती, तो शिंदे सरकार का गठन नहीं हो पाता.
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इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने खुद सुनवाई टालने के लिए स्टे क्यों मांगा था. वहीं जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सरकार का गठन न होना इस बात पर निर्भर करता है कि मामले की सुनवाई हो और फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में आए.
इस पर सिब्बल ने जवाब दिया कि फैसला उनके पक्ष में ही होना चाहिए, क्योंकि संविधान की दसवीं अनुसूची पूरी तरह स्पष्ट है. उन्होंने कहा कि यह स्थिति अब देश में बार-बार देखने को मिल रही है. किसी राज्य से एक पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद नेता किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने का दावा करते हैं.
सिब्बल ने इसे 'संवैधानिक आत्महत्या' बताते हुए कहा कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि जनप्रतिनिधि उसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करे, जिसके चुनाव चिह्न पर जनता ने उसे चुना है. शिवसेना मामले में आगे सुनवाई चार अगस्त मंगलवार को होगी.
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