सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता के दायर में विधायकों के बहुमत परीक्षण को सवालिया निशान पर रखा
कोर्ट ने यह पूछताछ की कि क्या किसी राजनीतिक दल की वैधता निर्धारित करने के लिये बहुमत पर निर्भर रहना उचित है, जब उन बहुमत को बनाने वाले कई विधायकों पर अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो। यह विवाद एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के समूहों के बीच शिवसेना के सिंबल और नाम को लेकर चल रहे मुक़दमों से जुड़ा है, जहाँ चुनाव आयोग के निर्णय पर भी दलीलें पेश की जा रही थीं।

सौजन्य से:- ETV Bharat
शिवसेना विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता का सामना कर रहे विधायकों के बहुमत परीक्षण पर सवाल उठाए
बेंच ने आगे कहा कि दोनों ग्रुप को अलग-अलग सिंबल चुनने और अपनी ताकत पर चुनाव लड़ने का निर्देश दिया जा सकता था.
By Sumit Saxena
Published : September 17, 2026 at 9:32 AM IST
नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूछा कि क्या विधायी बहुमत किसी राजनीतिक दल का स्वामित्व तय करने के लिए एक वैध पैमाना हो सकता है. खासकर तब जब उस बहुमत को बनाने वाले उन्हीं विधायकों के खिलाफ अयोग्यता कार्रवाई लंबित हो.
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने एकनाथ शिंदे के ग्रुप से यह सवाल पूछा. बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना भी थे. बेंच ने उन लेजिस्लेटर के नंबर स्ट्रेंथ पर निर्भर रहने की कानूनी मुश्किलों की ओर ध्यान दिलाया, जिनकी हैसियत खुद जांच के दायरे में थी. सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने एकनाथ शिंदे के ग्रुप की ओर से आखिरी दलीलें दीं.
बेंच उद्धव ठाकरे गुट की उस चुनौती पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग (ECI) के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें एकनाथ शिंदे के ग्रुप को 'असली शिवसेना' माना गया और उसे पार्टी का नाम और सिंबल दिया गया. यह महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर के जनवरी 2024 के उस फैसले को चुनौती पर भी सुनवाई कर रही थी जिसमें दसवीं अनुसूची के तहत किसी भी गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया गया था.
बेंच ने कौल से पूछा, 'हालांकि लेजिस्लेटिव मेजॉरिटी एक जरूरी टेस्ट है, लेकिन क्या यह हमेशा तय करने वाला या सेफ टेस्ट हो सकता है, जहां उन्हीं लेजिस्लेटर से जुड़ी डिसक्वालिफ़िकेशन प्रोसीडिंग्स पेंडिंग हों?' कौल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार दिए गए फैसलों में भी लेजिस्लेटिव मेजॉरिटी टेस्ट को एक बहुत बड़ा टेस्ट कहा गया है, क्योंकि यह किसी खास मामले में इसका कारण बताता है.
बेंच ने कहा, 'जैसा कि आप कहते हैं, यह चुनाव आयोग के पास बहुत ज़्यादा अधिकार है, जो रिप्रेजेंटेटिव पार्टी डेमोक्रेसी के मामले में एक एक्सपर्ट बॉडी है. यह समझना कि वे सिंबल कहाँ और किस तरह से बांटने जा रहे हैं. हम ज्यूडिशियल रिव्यू में हैं, हम चुनाव आयोग की कुर्सी पर नहीं बैठते हैं.'
बेंच ने कहा कि उसे यह देखना होगा कि क्या मौजूद ऑप्शन पर सही कानूनी आधार पर विचार किया गया था. जस्टिस बागची ने कहा कि अगर सभी टेस्ट गलत थे, तो चुनाव आयोग के पास दोनों ग्रुप को रिजर्व सिंबल देने से मना करने और उन्हें अपनी ताकत का इस्तेमाल करके अलग-अलग सिंबल पर चुनाव लड़ने के लिए कहने का भी ऑप्शन था.
कौल ने कहा कि हर कोई पार्टी के संविधान को मानने का दावा करता है, लेकिन जब हम ऑर्गेनाइज़ेशनल स्ट्रक्चर की जांच करते हैं तो हमें क्या मिलता है? उन्होंने आगे कहा कि पार्टी तानाशाही से चलती है और इसमें कामचोरी की पहचान है, जिसमें दो-तिहाई से ज़्यादा सदस्य पार्टी प्रेसिडेंट द्वारा अपॉइंट किए जाते हैं. उन्होंने पूछा कि क्या ऐसा ऑर्गेनाइज़ेशन जमीनी स्तर के वर्कर्स की इच्छा को दिखाता है.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने आखिरकार यह माना कि इस मामले के अजीब फैक्ट्स को देखते हुए, लेजिस्लेटिव मेजॉरिटी ही एकमात्र काम करने लायक टेस्ट था. उन्होंने आगे कहा कि सुभाष देसाई जजमेंट में बार-बार यह माना गया है कि चुनाव आयोग अपनी पूरी और बड़ी शक्तियों का इस्तेमाल करके किसी मामले के खास तथ्यों और हालात के हिसाब से टेस्ट बना सकता है. बेंच को बताया गया कि शिवसेना का ऑर्गेनाइज़ेशनल स्ट्रक्चर ज़्यादातर नॉमिनेटेड सदस्यों से बना था और यह पार्टी या उसके कैडर की उम्मीदों को नहीं दिखाता था.
बेंच ने कहा कि किसी भी ग्रुप को रिजर्व सिंबल का फायदा देने की जरूरत नहीं थी. बेंच ने आगे कहा कि दोनों ग्रुप को अलग-अलग सिंबल चुनने और अपनी ताकत पर चुनाव लड़ने का निर्देश दिया जा सकता था, न कि शिवसेना के फाउंडर स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की ताकत पर. इस मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी.
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
बिल गेट्स ने चेतावनी दी: गलत हाथों में एआई से 100 करोड़ जीवन का खतरा, सरकार से कड़े नियमों की माँग

कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा: डिजिटल क्षेत्र में जातिगत गाली पर आपराधिक कार्रवाई संभव

दिल्ली HC: मुस्लिम वैवाहिक शादियों से POCSO का अपवाद नहीं

सुप्रीम कोर्ट में लॉ छात्र अक्षत त्रिपाठी की नई याचिका, यूपी सरकार पर भ्रामक जानकारी का आरोप

चुनाव आयोग का फ़ॉर्म‑६ बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट का समर्थन कथन विवादास्पद

उत्तरी प्रदेश सरकार ने कोर्ट को गुमराह किया, नोटिस देने वाले कार्यकारी मैजिस्ट्रेट को निलंबित नहीं किया: लॉ छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

सुप्रीम कोर्ट ने EC नियुक्ति विधि पर विभाजित रुख अपनाया: क्या बदलेगा चुनावी स्वतंत्रता?

संवैधानिक न्यायालय ही लगा सकते हैं संशोधित आजीवन कारावास, ट्रायल कोर्ट नहीं: सुप्रीम कोर्ट
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जमानत में न्यायाधीश नहीं थोप सकते निजी नैतिकता
- सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक ऊर्जा मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार शिकायत को खारिज करने वाले हाई कोर्ट आदेश को बरकरार रखा, भाजपा MLA की अपील खारिज
- उच्च न्यायालय ने SGPC कर्मचारियों की बर्खास्तगी को उलट दिया, पाया 'भुकी' की पुनःप्राप्ति का सबूत अप्रमाणित
- बिल गेट्स की चेतावनी: अनियंत्रित AI से हो सकता है 100 करोड़ मौतों का जोखिम
- गोवा में धर्म‑परिवर्तन बिल को मिली आंतरिक विरोध से ठप्पी
- दिल्ली में ट्रैफ़िक चालान निपटाने का सुनहरा मौका: 25 अक्टूबर को लोक अदालत
- कर्नाटक के डीजीपी ने सेक्शन 35 बीएनएसएस के कड़ाई से पालन के लिए निर्देश जारी, पुलिस को व्यक्तिगत जवाबदेही की चेतावनी
- सुप्रीम कोर्ट ने फाइटर पायलट की विधवा को वायु सेना में पुनः भर्ती का आदेश दिया

