हाईकोर्ट ने संबंध छुपाने की कोशिश पर सुरक्षा याचिका खारिज की
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक विवाहित महिला (छह बच्चों की मां) और एक विवाहित पुरुष (दो बच्चों के पिता) द्वारा दायर पुलिस सुरक्षा याचिका को अस्वीकार कर दिया। जस्टिस आलोक जैन ने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने कोई ठोस खतरे का प्रमाण नहीं दिया और याचिका को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए खारिज किया। अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कानून के दुरुपयोग से बचाने की जरूरत पर बल दिया।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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दो बच्चों के पिता को दिल दे बैठी छह बच्चों की मां: फिर सुरक्षा के लिए पहुंचे हाईकोर्ट, अदालत ने लगाई फटकार
Tue, 15 Sep 2026 07:59 PM IST
शाहिल शर्मा
अमर अजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर अजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Tue, 15 Sep 2026 07:59 PM IST
सार
जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि याचिकाकर्ता कथित खतरे के संबंध में कोई ठोस और विशिष्ट आधार प्रस्तुत नहीं कर सके। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिका कानूनी प्रक्रिया की आड़ में संबंध को ढकने का प्रयास प्रतीत होती है।
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आठ बच्चों के अभिभावक एक विवाहित महिला और पुरुष की ओर से दायर सुरक्षा याचिका खारिज कर दी है। दोनों अलग-अलग लोगों से पहले से विवाहित हैं। महिला के 6 तो वहीं पुरुष के 2 बच्चे मौजूद हैं। दोनों ने परिवार की ओर से खतरा बताते हुए साथ रहने और अपने जीवन व स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पुलिस सुरक्षा की मांग की थी।
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जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि याचिकाकर्ता कथित खतरे के संबंध में कोई ठोस और विशिष्ट आधार प्रस्तुत नहीं कर सके। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिका कानूनी प्रक्रिया की आड़ में संबंध को ढकने का प्रयास प्रतीत होती है और यह कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान है। पलवल निवासी दोनों याचिकाकर्ताओं ने बताया था कि वे बालिग हैं और परिवार की इच्छा के विरुद्ध साथ रह रहे हैं।
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इसके कारण उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं और वे अपने घर वापस जाने की स्थिति में नहीं हैं। सरकार ने बताया कि पुरुष विवाहित है और उसके दो बच्चे हैं। महिला भी विवाहित है और छह बच्चे हैं। शिकायत के बाद संबंधित लोगों और ग्रामीणों के बयान दर्ज किए गए, लेकिन किसी वास्तविक खतरे की पुष्टि नहीं हुई।
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हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है और राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल कानून के शासन को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को उनके वैध जीवनसाथियों तथा बच्चों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार के साथ संतुलित करके देखना होगा।
केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पुलिस सुरक्षा का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने माना कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई ठोस खतरा सामने नहीं आया है। साथ ही कहा कि मांगी गई सुरक्षा देने से पूरे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि हम उन जीवनसाथियों व बच्चों के प्रति मुंह नहीं मोड़ सकते जिन्हें याचिकाकर्ताओं के कृत्य के कारण समाज का सामना करना पड़ेगा।
केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पुलिस सुरक्षा का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने माना कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई ठोस खतरा सामने नहीं आया है। साथ ही कहा कि मांगी गई सुरक्षा देने से पूरे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि हम उन जीवनसाथियों व बच्चों के प्रति मुंह नहीं मोड़ सकते जिन्हें याचिकाकर्ताओं के कृत्य के कारण समाज का सामना करना पड़ेगा।
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