पर्यावरण मंजूरी में बड़ा बदलाव: सुप्रीम कोर्ट ने पिछली तारीख से मंजूरी देने के नियम को रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2021 के उस ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया, जो परियोजनाओं को पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने की शक्ति देता था. यह फैसला पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसके मायने गहरे हो सकते हैं.

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पिछली तारीख से पर्यावरण मंजूरी देने का नियम रद्द, जानें कोर्ट के इस फैसले के मायने
इस नियम के तहत उन परियोजनाओं को मंजूरी देने की व्यवस्था बनाई थी, जो बिना जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी लिए ही शुरू कर दी गई थीं.
By Sumit Saxena
Published : July 29, 2026 at 3:14 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार के उस 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) को रद्द कर दिया, जो सरकार को परियोजनाओं को पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने की शक्ति देता था. इस नियम के तहत उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से मंजूरी देने की व्यवस्था बनाई गई थी, जो बिना जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी लिए ही शुरू कर दी गई थीं.
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने 49 याचिकाओं पर सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसका यह फैसला आगे से लागू होगा, यानी जिन परियोजनाओं को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, वे वैध रहेंगी.
फैसला सुनाते हुए जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा कि 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम एक प्रशासनिक आदेश है, जो बिना पूर्व मंजूरी के शुरू की गई परियोजनाओं को हमेशा के लिए पिछली तारीख से मंजूरी देने की व्यवस्था बनाता है.
जस्टिस बागची ने आगे कहा, "यह नियम 2006 के मूल कानून के तहत होने वाली जांच और मंजूरी देने के मानकों को पूरी तरह बदल देता है. इस तरह, 2021 का यह प्रशासनिक आदेश पहले से बने एक बड़े कानून की जगह लेता है, जो कि कानूनन गलत और अमान्य है."
जस्टिस बागची ने कहा कि वैसे भी, सभी तरह की परियोजनाओं पर लागू होने वाली इस "हमेशा के लिए माफी योजना" में ऐसा कोई साफ आधार नहीं दिया गया है कि किन परियोजनाओं को पिछली तारीख से मंजूरी दी जाए. साथ ही, इसका जनहित से भी कोई सीधा और तर्कसंगत संबंध नहीं दिखता है.
जस्टिस बागची ने आगे कहा कि इसलिए यह नियम 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' के मूल उद्देश्य के खिलाफ है. इस कानून का असली मकसद 'सतत विकास' और 'सावधानी के सिद्धांत' के बीच संतुलन बनाकर पर्यावरण की रक्षा करना है.
जस्टिस बागची का यह भी कहना था कि इन परिस्थितियों में, यह ऑफिस मेमोरेंडम निष्पक्षता और तर्कसंगतता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है. पीठ ने कहा कि इस नियम की वैधता को लेकर बने भ्रम और जनहित को ध्यान में रखते हुए, 2021 के इस आदेश को आगे के लिए रद्द किया जाता है.
विभिन्न पक्षों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों ने पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पिछली तारीख से मंजूरी देने का विरोध किया. उन्होंने दलील दी कि सरकारी अधिकारियों और संस्थाओं को बेखौफ होकर नियमों का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, और न ही वे यह उम्मीद कर सकते हैं कि बाद में सिर्फ जुर्माना भरकर सब कुछ ठीक कर लिया जाएगा.
सर्वोच्च अदालत ने 16 मई, 2025 के अपने 'वनशक्ति' फैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं.
16 मई, 2025 को जस्टिस (अब सेवानिवृत्त) ए एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों को नियमों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पिछली तारीख से मंजूरी देने से रोक दिया था.
हालांकि, नवंबर 2025 में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने 2:1 के बहुमत के फैसले से ऐसी परियोजनाओं को भारी जुर्माना देकर पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी मिलने का रास्ता साफ कर दिया था. पीठ ने तब यह दलील दी थी कि ऐसा न करने पर "हजारों करोड़ रुपये बर्बाद हो जाएंगे."
सर्वोच्च अदालत ने माना था कि यदि 16 मई, 2025 के फैसले को वापस नहीं लिया गया, तो सरकारी खजाने के लगभग 20,000 करोड़ रुपये से बनी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं ध्वस्त कर दी जाएंगी. इसके बाद अदालत ने इन याचिकाओं पर नए सिरे से सुनवाई करने का आदेश दिया था.
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