सुप्रीम कोर्ट ने मेथनॉल‑रंग नियम रद्द किया, शराबबंदी को ‘जबरन पाबंदी’ कहा
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की जहरीली शराब रोकने वाली ‘पॉइज़न्स रूल्स’ के प्रावधानों को खारिज कर दिया, यह कहा कि शराब में रंग‑कड़वा पदार्थ मिलाना लत को नहीं घटाता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्रतिबंधात्मक उपाय नशे को underground ले जाते हैं और मूल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, साथ ही अधिक समन्वित नियंत्रण की जरूरत पर बल दिया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
'जबरन पाबंदी, शराब की लत का इलाज नहीं': शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को दी सख्त चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब रोकने के नाम पर मेथनॉल में रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने का महाराष्ट्र सरकार का नियम रद्द कर दिया.
By Sumit Saxena
Published : September 18, 2026 at 8:14 PM IST
नई दिल्लीः जहरीली शराब की त्रासदियों पर अंकुश लगाने के महाराष्ट्र के प्रयास पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चेतावनी दी कि जबरन संयम शराब की लत का इलाज नहीं है. शीर्ष अदालत ने 'महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स' (Maharashtra Poisons Rules) के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया, जिसके तहत जहरीली शराब की त्रासदियों को रोकने के लिए गैर-दवा निर्माताओं को बेचने से पहले मेथनॉल में एक विशेष रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना अनिवार्य किया गया था.
मेथनॉल में कड़वे और रंगीन पदार्थों को मिलाने की निरर्थकता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध लेखक मार्क टवेन का हवाला दिया, जिन्होंने कहा था, "ऐसे सबूत सामने आए हैं जो साबित करते हैं कि शराबबंदी केवल नशे को दरवाजों के पीछे और अंधेरी जगहों पर धकेलती है, यह इसे ठीक नहीं करती या कम भी नहीं करती है."
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने माना कि मुंबई में एक बड़ी जहरीली शराब त्रासदी के बाद 2011 की अधिसूचना के माध्यम से 'महाराष्ट्र पॉइज़न्स रूल्स' में शामिल किए गए नियम 18A और 18B, संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 19(1)(g) (आजीविका/व्यापार का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं.
पीठ ने कहा कि मेथनॉल में कड़वा और रंगीन पदार्थ मिलाने से शराब की लत को दबाया नहीं जा सकता. इसकी अनुपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उत्पाद शुल्क कानूनों के तहत परिवहन और भंडारण के अधिक सख्त नियामक उपाय होने चाहिए. कोर्ट ने आगे कहा कि मौजूदा कदम पूरे उद्योग को ही खतरे में डाल देता है और यह 'पेड़ बचाने के चक्कर में पूरे जंगल को खो देने' जैसा होगा.
पीठ ने फैसला सुनाया, "हमारा यह सुविचारित मत है कि विवादित नियम आनुपार्किकता के परीक्षण में विफल रहते हैं, और गैर-दवा निर्माताओं के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं."
पीठ ने कहा कि शराब की लत से मजबूर लोगों को न तो स्वाद और न ही रंग रोक सकता है. साथ ही कोर्ट ने आगाह किया कि इस तरह के अत्यधिक नियामक नियंत्रण से वैध केमिकल व्यवसायों की बर्बादी का खतरा बढ़ जाता है.
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास इस बात का गवाह है कि शराब पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से अक्सर शराब का कारोबार भूमिगत हो जाता है, जिससे अनियमित और जानलेवा शराब का चलन बढ़ जाता है. कोर्ट ने आगे कहा, "गुजरात राज्य का ही मामला ले लीजिए. गुजरात राज्य में सख्त शराबबंदी नीति लागू है. यह एक ड्राई स्टेट है. इसके बावजूद, गुजरात के गठन और आजादी के बाद से वहां कम से कम दस बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हो चुकी हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की जान गई है."
पीठ ने कहा कि हाल ही में गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई जहरीली शराब त्रासदियां, जिनमें क्रमशः लगभग 13 और 15 लोगों की जान गई थी, अधिकारियों को जागने और सख्त कदम उठाने की याद दिलाती हैं.
शीर्ष अदालत ने जहरीली शराब की त्रासदियों को रोकने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कई उपायों का सुझाव दिया. कोर्ट ने नकली शराब के अवैध निर्माण, परिवहन और बिक्री को रोकने के लिए एक समन्वित और बहु-विभागीय दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया.
महाराष्ट्र सरकार ने 1991 की जहरीली शराब त्रासदी के बाद इन नियमों को शामिल किया था, जिसमें मुंबई के अंधेरी स्थित 'छाया बार' से खरीदी गई नकली शराब पीने से लगभग 250 लोग प्रभावित हुए थे. पीठ ने कहा, "शराब पीने वाले लोगों को बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वे जिस चीज का सेवन कर रहे थे वह मेथनॉल था, जो किसी जहर से कम नहीं है. इसके परिणामस्वरूप, लगभग 93 लोगों की जान चली गई थी."
पीठ ने उल्लेख किया कि मुंबई में 1991 की 'छाया बार' जहरीली शराब त्रासदी के बाद पार्थसारथी समिति का गठन किया गया था. पीठ ने कहा कि पार्थसारथी समिति की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ने पर पता चलेगा कि शराब त्रासदियों के लिए केवल लाइसेंसधारियों द्वारा अवैध रूप से मेथनॉल बेचे जाने के अलावा भी कई अन्य कारण जिम्मेदार थे.
कोर्ट ने आगे कहा कि समिति द्वारा पहचाने गए अन्य कारणों में शामिल थे- अवैध और बिना लाइसेंस वाले चैनलों के माध्यम से मेथनॉल का डायवर्जन, एथिल अल्कोहल के मुकाबले एक सस्ते विकल्प के रूप में मेथनॉल की उपलब्धता, कानून प्रवर्तन एजेंसियों में भ्रष्टाचार, एथिल और मिथाइल अल्कोहल के बीच वास्तविक भ्रम, और चोरी. कोर्ट ने कहा कि विवादित नियमों द्वारा बनाए गए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के बावजूद ये सभी कारण और वजहें लगातार काम करती रह सकती हैं.
पीठ ने कहा, "दूसरे शब्दों में, बाजार में नकली शराब की आपूर्ति करने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा इन विवादित नियमों के दायरे से बाहर रहकर काम करता है."
शीर्ष अदालत ने मेथनॉल का उपयोग करने वाले उद्योगों द्वारा दायर याचिकाओं और संशोधित नियमों की वैधता से जुड़ी एक अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. नियम 18A के तहत, विक्रेताओं के लिए खरीदार के 'फॉर्म ए' लाइसेंस की पुष्टि करके मेथनॉल के इच्छित उपयोग का पता लगाना अनिवार्य किया गया था. वहीं, नियम 18B में वैध 'फॉर्म ए' लाइसेंस के बिना मेथनॉल पाए जाने पर उसे जब्त करने का प्रावधान था.
पीठ ने कहा कि मेथनॉल एक खतरनाक और जहरीला पदार्थ है और वह इस बात से सहमत है कि इसकी बिक्री और कब्जे के लिए प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता है. पीठ ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में विफल रही कि इन विवादित उपायों का मेथनॉल से जुड़ी जहरीली शराब की त्रासदियों को रोकने के उद्देश्य से कोई तार्किक और सीधा संबंध था.
पीठ ने कहा, "इन विवादित नियमों को कानून बनाने की शक्ति का उपयोग करने में एक उचित या समझदारी भरा व्यावहारिक कदम नहीं कहा जा सकता. यह विवादित अधिसूचना पूरी तरह से मनमानी है और इसका उस उद्देश्य के साथ कोई तार्किक संबंध नहीं है जिसे हासिल करने की कोशिश की जा रही है, जिससे यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है."
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