सुप्रीम कोर्ट की समिति द्वारा एआई से न्यायिक फैसलों पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट की एआई समिति ने मसौदा नियमों में बताया है कि अदालतों में एआई का उपयोग हमेशा ‘मानवीय निर्णय और न्यायिक अधिकार के अधीन’ रहेगा. समिति ने कहा है कि एआई सिस्टम केवल सहायक भूमिका में काम करेंगे. हालांकि, मसौदे में एआई के कुछ सीमित उपयोगों की अनुमति दी गई है, जैसे कि केस मैनेजमेंट और न्यायिक संसाधनों के आवंटन में सहायता करना. समिति ने सिफारिश की है कि अदालतों में एआई के उपयोग संबंधी नियम, 2026 का प्रारंभिक मसौदा सार्वजनिक किया जाए.

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) समिति द्वारा प्रस्तावित मसौदा नियमों में एआई के जरिए न्यायिक फैसले लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव लाया गया है.
इसके अलावा, मुकदमे के पक्षकारों और गवाहों की प्रोफाइलिंग करने वाले एआई उपकरणों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाने की सिफारिश की गई है. अदालत की प्रक्रियाओं में ऐसे एआई सिस्टम के उपयोग पर भी प्रतिबंध प्रस्तावित है, जिनकी कार्यप्रणाली का खुलासा न किया गया हो या जिन्हें समझाया न जा सके.
इस समिति की अध्यक्षता जस्टिस पीएस नरसिम्हा कर रहे हैं. समिति में जस्टिस संजीव सचदेवा, जस्टिस राजा विजयराघवन वी., जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सूरज गोविंदराज सदस्य हैं. समिति ने मसौदा सिफारिशों पर सभी हितधारकों और आम जनता से 20 जून तक सुझाव और टिप्पणियां मांगी हैं. सुझाव 20 जून तक दिए जा सकते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (3 जून) को अदालतों में एआई के उपयोग संबंधी विनियम, 2026 का प्रारंभिक मसौदा सार्वजनिक किया. समिति ने इस मसौदे में कहा है कि अदालतों की कार्यवाही में एआई का उपयोग हमेशा ‘मानवीय निर्णय और न्यायिक अधिकार के अधीन’ रहेगा.
प्रारंभिक मसौदे के अनुसार, एआई सिस्टम केवल सहायक भूमिका में काम करेंगे और ‘विधिवत नियुक्त न्यायिक अधिकारी द्वारा न्यायिक अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग का स्थान नहीं ले सकते और न ही उसे प्रभावित कर सकते हैं.’ मसौदे में यह भी कहा गया है कि ‘कानून, तथ्य और न्याय से जुड़े मामलों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल संबंधित न्यायिक अधिकारियों के पास ही होगा.’
मसौदे में कहा गया है, ‘ऐसे किसी भी एआई सिस्टम को लागू नहीं किया जाएगा जो नस्ल, धर्म, जाति, लिंग, जेंडर, किसी तरह की शारीरिक अक्षमता, भाषा, आर्थिक स्थिति या संविधान अथवा किसी प्रचलित कानून द्वारा निषिद्ध किसी अन्य आधार पर पक्षपात को बढ़ावा दे, उसे और मजबूत करे या नए पक्षपात को जन्म दे. साथ ही महिलाओं, बच्चों, शारीरिक अक्षम व्यक्तियों, हाशिये और अल्पसंख्यक समुदायों तथा आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि के लोगों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए विशेष सावधानी बरती जाएगी.’
हालांकि मसौदे में एआई के कुछ सीमित उपयोगों की अनुमति भी दी गई है. इसके तहत केस मैनेजमेंट, कॉज लिस्ट तैयार करने, सुनवाई की तारीख तय करने, अदालत की कार्यवाही का ट्रांसक्रिप्शन, फैसलों के अनुवाद, कानूनी शोध, प्रशासनिक कार्यों जैसे मुकदमा दायर करने में सहायता, दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच, रिकॉर्ड प्रबंधन और न्यायिक संसाधनों के आवंटन में एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसके अलावा, अदालत की सेवाओं तक पहुंचने तथा अन्य आवश्यकताओं को समझने में मदद के लिए संवादात्मक एआई सहायक और चैटबॉट्स के उपयोग की भी अनुमति होगी. शारीरिक अक्षम व्यक्तियों या भाषा संबंधी बाधाओं का सामना कर रहे लोगों के लिए सुलभ सेवाओं तथा अदालत के रिकॉर्ड को एनोनिमाइज करने में भी एआई का इस्तेमाल किया जा सकेगा.
इस वर्ष फरवरी में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने वकीलों द्वारा एआई की मदद से तैयार की गई याचिकाएं दाखिल किए जाने पर चिंता जताई थी. पीठ ने कहा था कि ऐसी कुछ याचिकाओं में जिन मामलों का हवाला दिया गया था, वे वास्तविक नहीं थे.
सीजेआई ने कहा था, ‘यह देखकर हम चिंतित हैं कि कुछ वकीलों ने अब याचिकाओं का मसौदा तैयार करने के लिए एआई का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. यह अनुचित है.’
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