सुप्रीम कोर्ट ने दिया कैंची किसी बेटे की कीमत पैसों में नहीं आँक सकती?
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना से जुड़े एक मामले में बड़ी खास टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि माता-पिता के भावनात्मक और सामाजिक नुकसान किसी निश्चित आंकड़े में नहीं बांधा जा सकता।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना से जुड़े एक मामले में बड़ी खास टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत का मानना है कि संतान की मृत्यु से माता-पिता को होने वाले नुकसान का आकलन केवल गणितीय फार्मूले से नहीं किया जा सकता। अदालत ने ऐसे मामलों में पूरी तरह से मानवीय दृष्टिकोण अपनाने पर भी जोर देने की बात की और मुआवजा बढ़ाया
नई दिल्ली: क्या किसी मां-बाप के लिए बेटों की कीमत पैसों में आंकी जा सकती है। अक्सर दुर्घटनाओं में खो चुके बच्चों के लिए मां-बाप को मुआवजा देने की परंपरा रही है। हाल ही में शीर्ष अदालत ने एक अहम फैसले में कहा है कि सड़क दुर्घटना में संतान की मृत्यु के बाद माता-पिता को होने वाली पीड़ा और नुकसान का आकलन केवल गणितीय फार्मूले से नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालयों को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए
मामले की पृष्ठभूमि और ट्रिब्यूनल के फैसले से असंतोष
मामला एक सड़क दुर्घटना में युवक की मृत्यु से जुड़ा था। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार मामले में मृतक, आकाश कुमार, CA की पढ़ाई कर रहा था और आर्टिकलशिप कर रहा था। एक शाम वह जिस कार में जा रहा था, वह सुबह करीब 3 बजे दिल्ली की सड़क पर खड़े एक ट्रक से टकरा गई। दावा करने वालों का तर्क था कि ट्रक बिना पार्किंग लाइट, रिफ्लेक्टर या चेतावनी संकेत के खड़ा किया गया था, जिससे अंधेरे में वह दिखाई नहीं दे रहा था। मृतक के माता-पिता ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण MACT के समक्ष मुआवजे की मांग की थी।
ऐसे मामलों में मृतक के मां - बाप को हुए नुकसान को किसी भी गणितीय फार्मूले से नहीं मापा जा सकता, और कुल मिलाकर देखा जाए तो दिया गया मुआवज़ा MV एक्ट के तहत 'उचित मुआवज़े' की सीमा का उल्लंघन नहीं करता है।
सुप्रीम कोर्ट की मामले में अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में तथ्यों पर ध्यान और मानवीय नजरिए की चर्चा
शीर्ष अदालत में यह मामला जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने सुना।
अदालत ने पाया कि निचली अदालतों ने मृतक की आय और माता-पिता की निर्भरता का यथार्थ मूल्यांकन नहीं किया था। क्योंकि माता-पिता का भावनात्मक और सामाजिक नुकसान किसी निश्चित आंकड़े में नहीं बांधा जा सकता।
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य पीड़ित परिवारों को उचित और प्रभावी राहत प्रदान करना है। इसलिए जब निचली अदालतें वास्तविक नुकसान का सही आकलन नहीं कर पातीं, तब सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी बेटे या बेटी की मृत्यु से माता-पिता को केवल आर्थिक क्षति नहीं होती। संतान परिवार का भावनात्मक सहारा भी होती है। वृद्धावस्था में देखभाल, सहयोग और मानसिक संबल का नुकसान भी एक वास्तविक क्षति है।
अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में केवल आय के आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। न्यायालयों को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और पारिवारिक संबंधों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना मुआवजा कानून एक कल्याणकारी व्यवस्था है। इसका उद्देश्य पीड़ित परिवार को उचित राहत देना है। यदि उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि मृतक परिवार की सहायता कर रहा था या भविष्य में कर सकता था, तो मुआवजे का निर्धारण व्यावहारिक और यथार्थवादी तरीके से होना चाहिए।
फिर अदालत ने यह भी माना कि मोटर दुर्घटना दावा मामलों में न्यायसंगत मुआवजा ही सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि माता-पिता को दिया गया पहले दिया गया मुआवजा न्यायोचित नहीं था।
अदालतों को अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा
देखा जाए तो इस मामले के फैसले के दूरगामी असर देखे जा सकते हैं। इससे ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट को यह संदेश गया है कि माता-पिता की पीड़ा को केवल आंकड़ों और फार्मूलों तक सीमित नहीं किया जा सकता। सड़क दुर्घटनाओं में संतान खोने वाले परिवारों के मामलों में अदालतों को अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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