जागरण संपादकीय सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति - Supreme Court Committee to Probe Parliament March Violence
जागरण संपादकीय: सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति किसी भीड़ को संसद या विधानसभा की ओर जाने से रोकने के लिए पुलिस कितना बल प्रयोग करे, इसे किसी समिति के लिए तय कर पाना कठिन है, भले ही वह कितनी भी उच्चाधिकार प्राप्त हो। यह तो मौ…

सौजन्य से:- Jagran
जागरण संपादकीय: सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति
किसी भीड़ को संसद या विधानसभा की ओर जाने से रोकने के लिए पुलिस कितना बल प्रयोग करे, इसे किसी समिति के लिए तय कर पाना कठिन है, भले ही वह कितनी भी उच्चाधिकार प्राप्त हो। यह तो मौके पर मौजूद पुलिस ही भीड़ के रुख-रवैये के आधार पर तय कर सकती है।
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट समिति संसद मार्च हिंसा की जांच कर रही है
- समिति की रिपोर्ट के लिए समयसीमा तय होनी चाहिए
- विरोध प्रदर्शनों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तय करना आवश्यक
नीट-यूजी प्रश्न पत्र लीक होने के मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर काकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से जो पांच सदस्यीय समिति गठित की गई, उसके बारे में यह स्पष्ट नहीं कि वह अपनी रिपोर्ट कब देगी। अच्छा होता कि इस समिति के लिए कोई समयसीमा तय की जाती।
निःसंदेह इस मामले में किसी निष्पक्ष जांच समिति की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की ही पूर्ति सुप्रीम कोर्ट ने की। अब अच्छा यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों से लैस यह समिति अपनी रिपोर्ट यथाशीघ्र दे, ताकि उन कारणों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला समाप्त हो सके, जिनके चलते संसद मार्च में हिंसा हुई।
इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सामने आना आवश्यक है कि क्या सीजेपी समर्थकों की भीड़ में हिंसा पर आमादा तत्व भी शामिल थे या फिर पुलिस ने अकारण आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया? इन सवालों के जवाब तलाशते हुए सुप्रीम कोर्ट समिति यह भी स्पष्ट करे तो बेहतर कि क्या पुलिस को बिना अनुमति निकाले जा रहे सीजेपी के संसद मार्च को संसद परिसर जाने देना चाहिए था-और वह भी तब संसद का सत्र चल रहा था?
यदि कहीं कोई भीड़ संसद या विधानसभा की ओर कूच कर रही हो तो पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसे रोके। हाल में झारखंड में यही किया गया। किसी भीड़ को संसद या विधानसभा की ओर जाने से रोकने के लिए पुलिस कितना बल प्रयोग करे, इसे किसी समिति के लिए तय कर पाना कठिन है, भले ही वह कितनी भी उच्चाधिकार प्राप्त हो। यह तो मौके पर मौजूद पुलिस ही भीड़ के रुख-रवैये के आधार पर तय कर सकती है।
ऐसे में उचित यही होगा कि यह समिति धरना-प्रदर्शन का प्रोटोकाल तय करे, जिसकी आवश्यकता का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने किया था। इसकी अनदेखी न की जाए कि सुप्रीम कोर्ट समिति केवल सीजेपी और विपक्षी दलों के आरोपों की ही जांच नहीं करेगी। वह पुलिस पर हमला करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की भी जांच करेगी।
ऐसा किया जाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि सीजेपी के साथ विपक्षी दलों ने एक ऐसा माहौल बनाया, मानो भीड़ ने कुछ नहीं किया, वह बिल्कुल शांत एवं संयमित थी और फिर भी पुलिस ने उस पर आंसू गैस के गोले दागे, लाठियां चलाईं और पैलेट गन का इस्तेमाल किया। ऐसा नहीं था, यह इससे सिद्ध होता है कि संसद मार्च के दौरान जहां पुलिस के बल प्रयोग से कई प्रदर्शनकारी चोटिल हुए, वहीं अनेक पुलिसकर्मी भी घायल हुए, क्योंकि भीड़ ने बैरिकेडिंग तोड़कर उन पर पथराव किया था।
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