स्टैंडर्ड चार्टर्ड को 23 साल पुराने आपराधिक मामले से मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक को बड़ी राहत देते हुए 23 साल पुराने आपराधिक मामले और समन आदेश को रद्द कर दिया। इस फैसले से बैंक और उसके अधिकारियों पर अनिश्चितकाल तक अटकी रहने से राहत मिलेगी।

सौजन्य से:- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया स्टैंडर्ड चार्टर्ड के खिलाफ 23 साल पुराना मामला, 3 दशक पुराने ट्रांजैक्शन से जुड़ा था केस
देश की टॉप अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि इस मामले को अब खत्म करना ही उचित है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक को बड़ी राहत देते हुए 23 साल पुराने आपराधिक मामले और समन आदेश को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने ब्रिटिश मल्टीनेशनल बैंक के खिलाफ मामले को रद्द करते हुए कहा कि शिकायत का समर्थन करने वाला कोई भी दस्तावेजी सबूत नहीं था। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने अपने अंतर्निहित अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मामला 23 सालों से पेंडिंग है और 3 दशक पुराने ट्रांजैक्शन से जुड़ा होने के बावजूद सुनवाई समन जारी होने के चरण से आगे नहीं बढ़ सकी।
बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे खत्म करना ही उचित
देश की टॉप अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि इस मामले को अब खत्म करना ही उचित है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि शिकायत विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA), 1973 के तहत कथित 'स्पष्टीकरण नोटिस' पर आधारित थी, लेकिन शिकायतकर्ता आज तक इसका कोई ठोस रिकॉर्ड या सटीक तारीख पेश नहीं कर सका।
मामले को जारी रखना बैंक और उसके अधिकारियों को अनिश्चितकाल तक अटकी हुई स्थिति में रखने जैसा
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि ऐसे हालात में मामले को जारी रखना बैंक और उसके अधिकारियों को अनिश्चितकाल तक अटकी हुई स्थिति में रखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 397 के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने से धारा 482 के तहत याचिका की सुनवाई पर रोक नहीं लगती। दोनों प्रावधान अलग-अलग दायरे में काम करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों के रवैये पर भी उठाए सवाल
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि FERA कानून की धारा 61(2) के तहत 'स्पष्टीकरण नोटिस' देना अनिवार्य है। इसके बिना न तो वैध शिकायत दर्ज की जा सकती है और न ही मजिस्ट्रेट संज्ञान ले सकता है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में जांच एजेंसियों के रवैये पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि रिकॉर्ड से लंबे समय तक बिना किसी ठोस कार्रवाई के लापरवाही साफ दिखाई देती है।
ये भी पढ़ें
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
ECI के दावे पर संदेह: क्या सुप्रीम कोर्ट ने नया फॉर्म‑6 घोषणा मंज़ूर किया?

बबेरू के दूकानदारों को सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश, विवाद में मिली राहत

तेलंगाना हाईकोर्ट ने SRSP विस्थापित महिला को कृषि भूमि न मिलने पर सरकार को किया कड़ा सवाल

फु क्वोक में छात्र मॉक ट्रायल से कानूनी ज्ञान और सामाजिक कौशल हासिल करते हैं

हाईकोर्ट ने किठौर मामले में आरोपी की जमानत अस्वीकृत, गवाहों पर दबाव की सम्भावना को प्राथमिकता दी

सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में 16,726 अवैध निर्माणों को सील‑ध्वस्त करने का आदेश दिया

हाईकोर्ट ने डॉक्टरों को चेतावनी: इलाज में देरी नहीं, २५,००० रुपये जुर्माना

MP उच्च न्यायालय में याचिकाओं से टैक्स ऑडिट डेडलाइन पर बढ़े प्रश्न
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को विवादास्पद नागरिकता डेटाबेस के उपयोग की स्वीकृति दी
- सुप्रीम कोर्ट ने SAVE डेटाबेस के इस्तेमाल को मंजूरी दी, ट्रम्प प्रशासन को राहत
- कानून का सही उपयोग: बहादुरपुर में एससी-एसटी अधिनियम पर बैठक
- सुप्रीम कोर्ट ने हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की याचिका खारिज की, आदेश से नहीं थोप सकते भाषा
- एपी हाई कोर्ट ने अमरावती को राजधानी मानने के बाद तीन‑राजधानी प्रस्ताव को निरर्थक घोषित किया
- सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं रोका SIR?
- महिला पहलवानों ने बृजभूषण सिंह की बरी को चुनौती, दिल्ली कोर्ट में दायर की अपील
- ICU सुधार में नया कदम: कोर्ट ने बुनियादी ढाँचा 9 महीने, स्टाफिंग 6 महीने में पूरा करने का आदेश

