सुप्रीम कोर्ट की बड़ी राहत: 25 साल कानूनी लड़ाई के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल अधिकारी को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक अधिकारी को 25 साल कानूनी लड़ाई के बाद बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा कि उसका करियर विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और अदालत के आदेशों की अवहेलना के कारण बर्बाद हो गया।

सौजन्य से:- ndtv.in
25 साल तक न्याय के लिए लड़ने वाले CRPF अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. कोर्ट ने कहा कि होनहार अधिकारी का करियर बर्बाद हो गया. कोर्ट ने 25 सालों से अधिक समय तक अपने सेवा संबंधी अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के अधिकारी प्रकाश कुमार दीक्षित को बड़ी राहत दी है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और अदालत के आदेशों की अनदेखी के कारण एक होनहार अधिकारी का करियर बर्बाद हो गया.
420 दिनों तक बिना स्वीकृत अवकाश के अनुपस्थित रहने का लगाया आरोप
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि सीआरपीएफ के एक होनहार अधिकारी का करियर विभागीय अधिकारियों की लापरवाही, अदालत के आदेशों की अवहेलना और लालफीताशाही की भेंट चढ़ गया. दरअसल, प्रकाश कुमार दीक्षित 1986 में सीआरपीएफ में सहायक कमांडेंट के पद पर नियुक्त हुए थे. 1995 में विभाग ने उन पर बिना अनुमति प्रभार सौंपने और 420 दिनों तक बिना स्वीकृत अवकाश के अनुपस्थित रहने का आरोप लगाते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया. दीक्षित ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी.
2011 में हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा
लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2011 में हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए विभाग को सजा पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया. बाद में हाईकोर्ट ने उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी 2014 में बरकरार रखा. 2015 में दीक्षित को 1995 से प्रभावी मानते हुए सेवा में बहाल तो कर दिया गया, लेकिन उन्हें ‘डीम्ड सस्पेंशन' पर रखा गया. विभागीय प्राधिकारी ने दोबारा विचार करने के बाद माना कि बर्खास्तगी की सजा अत्यधिक कठोर थी और उसकी जगह तीन वर्ष के लिए एक वेतन वृद्धि कम करने जैसी मामूली सजा देने का फैसला किया. हालांकि यह फैसला लागू नहीं किया गया. विभिन्न सरकारी विभागों के बीच फाइल घूमने के बाद 2018 में उन्हें एक बार फिर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. दीक्षित ने दूसरी बर्खास्तगी को भी दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी. 2019 में हाईकोर्ट ने 2018 की बर्खास्तगी रद्द करते हुए मामूली सजा को बहाल किया और वरिष्ठता, वेतन निर्धारण तथा पदोन्नति सहित सभी सेवा लाभ देने का आदेश दिया. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2020 में भी सही ठहराया. इसके बावजूद विभाग ने उन्हें पदोन्नति और अन्य लाभ सही तरीके से नहीं दिए. इसके खिलाफ दीक्षित ने अवमानना याचिका दायर की, जिसके बाद मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
पदोन्नति, वेतन और पेंशन संबंधी लाभों से वंचित रखा गया
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब बर्खास्तगी की सजा को अदालत ने बदलकर मामूली सजा कर दिया था तो वह सजा 1995 से ही प्रभावी मानी जाएगी न कि 2018 से. विभाग की यह व्याख्या पूरी तरह गलत थी और इसी कारण दीक्षित को पदोन्नति, वेतन और पेंशन संबंधी लाभों से वंचित रखा गया. अदालत ने केंद्र सरकार और सीआरपीएफ को निर्देश दिया कि प्रकाश कुमार दीक्षित को उनके बैचमेट्स के साथ देय तिथि से डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नति दी जाए . उन्हें सभी बकाया वेतन, संशोधित पेंशन और अन्य सेवा लाभ दिए जाएं. लंबी कानूनी लड़ाई और आदेशों के पालन में लापरवाही के लिए केंद्र सरकार दो महीने के भीतर ₹10 लाख मुकदमेबाजी खर्च के रूप में दीक्षित को अदा करें. इस शर्त के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही भी बंद कर दी.
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