सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी का व्यभिचार साबित होने पर पति को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति को पत्नी के व्यभिचार के आरोपों का जवाब देने के लिए स्पष्ट और ठोस सबूत पेश करने होंगे। अदालत ने यह फैसला एक व्यक्ति की अपील पर आया है, जो अपनी पत्नी से अलग रहने के बाद मेंटिनेंस की मांग कर रहा था, जिसे उसकी पत्नी ने रिजेक्ट किया था।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों का यह मानना त्रुटिपूर्ण होगा कि ऐसे आरोप पर निर्णय केवल सुनवाई के अंतिम चरण में ही किया जा सकता है।
एडल्टरी साबित होने पर पत्नी को नहीं मिलेगी एडल्टरी
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, 'चूंकि, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125(4) में यह प्रावधान है कि अगर व्यभिचार का आरोप साबित हो जाता है, तो पत्नी न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुजारा-भत्ता की हकदार होगी। इसलिए हमारा मत है कि अगर पति धारा 125(4) के तहत आवेदन करता है और शुरू में ही सबूतों के आधार पर प्रथम दृष्टया आरोप साबित कर देता है, तो अंतरिम गुजारा-भत्ता पर रोक लगाई जा सकती है।''पेश करने होंगे ठोस सबूत'
अदालत ने कहा कि व्यभिचार से जुड़े मामलों में अक्सर परिस्थिति और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की गहन जांच करनी पड़ती है, जिसमें समय लगता है। ऐसे में अंतिम फैसले तक इंतजार करना कानून की मंशा के विपरीत होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होगा। पति को ऐसे ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने होंगे, जो पहली नजर में ही आरोपों की पुष्टि करते हों।बेंच ने अपने फैसले में आगे कहा गया कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि ऐसे सवाल का फैसला सिर्फ अंतिम सुनवाई के चरण में ही किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, इस नजरिए से कानून में दी गई व्यवस्था बेकार हो जाएगी।
पति ने कोर्ट में पेश किए 92 वीडियो
मामले में पति ने पत्नी के खिलाफ सबूत के तौर पर कई तस्वीरें और 92 वीडियो अदालत में पेश किए थे। अदालत ने आशंका जताई कि ये सामग्री किसी निजी जासूस की मदद से जुटाई गई होगी। इसके साथ ही अदालत ने निजी जांच एजेंसियों के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'धारा 125(4) के अनुसार, यदि पत्नी किसी अन्य शख्स के साथ व्यभिचार में रह रही हो, या बिना किसी ठोक कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती हो, या अगर वे सहमति से अलग रह रहे हों। तो फिर वह गुजारा भत्ता या अंतरिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी। बेंच ने कहा, 'अगर अंतरिम चरण में ही गुजारा-भत्ते की अर्जी को खारिज किया जाना है, तो धारा 125(4) के तहत अर्जी दाखिल करने वाले पक्ष को स्पष्ट और ठोस सबूत पेश करने होंगे जो पहली नजर में ही यह साबित कर दें कि गुजारा-भत्ता मांगने वाले व्यक्ति ने व्यभिचार किया है।'
शीर्ष अदालत का यह फैसला एक व्यक्ति की अपील पर आया है। व्याभिचार के आधार पर गुजारा भत्ता का विरोध करने वाली व्यक्ति की याचिका को राजस्थान उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, जिसे चुनौती देते हुए उसने शीर्ष अदालत का रुख किया था।
क्या है मामला?
- याचिकाकर्ता व्यक्ति और महिला का विवाह सात जुलाई 2014 को हुआ था। शादी के कुछ साल बाद ही उनके बीच परेशानियां शुरू हो गईं, जिसके कारण महिला ने कथित तौर पर पुरुष पर कई आरोप लगाए और पुलिस में शिकायतें भी दर्ज कराईं। आखिरकार, 13 मई 2020 को उसने अपने बच्चे और कीमती सामान के साथ ससुराल छोड़ दी।
- बाद में महिला ने उदयपुर के विशेष अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में अंतरिम गुजारा-भत्ता के लिए अर्जी दी। इसके बाद व्यक्ति ने भी सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत अर्जी दाखिल की और दलील दी कि पत्नी के व्यभिचारपूर्ण आचरण के कारण वह किसी भी तरह के अंतरिम गुजारा-भत्ता की हकदार नहीं है। हालांकि, अदालत ने उसकी अर्जी खारिज कर दी।
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