हाई कोर्ट ने रद की आपराधिक शिकायत, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक आपराधिक शिकायत को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के आधार पर रद कर दिया। कोर्ट ने कहा है कि इस मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल निजी विवादों के निस्तारण या दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है।

सौजन्य से:- Jagran
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रद कर दी पूरी शिकायत, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक आपराधिक शिकायत को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के आधार पर रद कर दिया। ...और पढ़ें
HighLights
- हाई कोर्ट ने आपराधिक शिकायत को रद किया।
- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
- आपराधिक न्याय प्रणाली निजी विवादों के लिए नहीं।
विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि यदि किसी आपराधिक शिकायत से न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का स्पष्ट मामला सामने आता है तो हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 215 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का स्वतः प्रयोग कर पूरी कार्यवाही निरस्त कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय का दायित्व केवल विवाद का निस्तारण करना ही नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना भी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने लखीमपुर खीरी की एक महिला द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए पारित किया। महिला ने विशेष न्यायाधीश, एससी-एसटी एक्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एफआईआर दर्ज कराने की उसकी अर्जी को शिकायत के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों का परीक्षण करते हुए न केवल निचली अदालत का आदेश रद कर दिया, बल्कि शिकायत के आधार पर चल रही पूरी कार्यवाही भी स्वतः संज्ञान लेते हुए निरस्त कर दी।
मामले में महिला ने आरोप लगाया था कि प्लाट की खरीद-बिक्री के विवाद के दौरान विपक्षी ने उसके पति के रुपये लौटाने का झांसा देकर उसका यौन शोषण किया। उसने यह भी आशंका जताई थी कि विपक्षी उसके पति और बच्चे को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
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कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य मानवीय व्यवहार के विपरीत और स्वाभाविकता से परे हैं। शिकायत में बल प्रयोग, धोखाधड़ी अथवा ऐसे किसी तथ्य का उल्लेख नहीं है, जिससे प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता हो। अदालत ने यह भी कहा कि हस्ताक्षरित चेकबुक घर में छूट जाने जैसी कहानी भी अविश्वसनीय है और एससी-एसटी एक्ट के किसी अपराध का भी कोई आरोप नहीं बनता।
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से प्रतीत होता है कि शिकायत का उद्देश्य विपक्षियों पर दबाव बनाकर कथित बकाया धन की वसूली करना था। सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल निजी विवादों के निस्तारण या दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।
यदि ऐसी कार्यवाही जारी रहने दी जाए तो यह न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्यायिक समय की अनावश्यक बर्बादी भी होगी।
यह भी पढ़ें- गन्ना किसानों के बकाया भुगतान पर हाई कोर्ट सख्त, गन्ना आयुक्त को किया तलब
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