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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: BCI को कानून छात्रों के व्यवहार पर कोई शक्ति नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा राज्य बार काउंसिल को लॉ छात्रों के अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार नहीं है; यह अधिकार केवल शैक्षणिक संस्थानों के पास है। यह निर्णय नालसार विश्वविद्यालय के दो पूर्व छात्रों की याचिका के संदर्भ में दिया गया।

3 सितंबर 2026 को 07:31 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: BCI को कानून छात्रों के व्यवहार पर कोई शक्ति नहीं

सौजन्य से:- Jagran

BSI के पास कानून के छात्रों का आचरण नियंत्रित करने का अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पास कानून के छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है।

HighLights

- सुप्रीम कोर्ट ने BCI के अधिकार क्षेत्र पर महत्वपूर्ण आदेश दिया।

- BCI को लॉ स्टूडेंट्स के आचरण नियंत्रित करने का अधिकार नहीं।

- छात्रों पर कार्रवाई का अधिकार शैक्षणिक संस्थानों के पास।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लॉ स्टूडेंट्स के अनुशासन और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीएसआई) के अधिकार क्षेत्र को लेकर गुरुवार को महत्वपूर्ण आदेश सुनाया। कोर्ट ने कहा है कि बीसीआई के पास कानून के छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएसआई और राज्य बार काउंसिल के पास कानून के छात्रों का खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है।

कहा यह अधिकार तब शुरू होता है, जब कोई लॉ ग्रेजुएट कानून के तहत एडवोकेट के रूप में एनरोल हो जाता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करना संबंधित शैक्षणिक संस्थान का विषय है। संस्थान अपने नियम, रेगुलेशन के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।

ये आदेश भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडेमी आफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (एनएएलएसएआर(नालसार)) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान दिया। मामला विश्वविद्यालय के दो पूर्व छात्रों की याचिका से संबंधित था।

याचिका में बीएसआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा द्वारा 13 अगस्त को जारी निर्देशों को चुनौती दी गई थी। नालसार के छात्रों की ओर से सीजेआइ सूर्यकांत की विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में प्रस्तावित भागीदारी को लेकर आपत्ति जताई गई थी। इसके बाद बीएसआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्र की ओर से निर्देश जारी कर नालसार के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स के एडवोकेट के तौर पर एनरोलमेंट पर अगले आदेश तक रोक लगाने की बात कही गई थी।

साथ ही सीजेआई के खिलाफ कथित अभियान को लेकर छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ जांच की मांग भी की गई थी। इन निर्देशों के सामने आने के बाद जब विवाद बढ़ गया तो बीएसआई ने उन्हें कुछ ही समय बाद वापस ले लिया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाया था कि आखिर बीएसआई चेयरमैन ने यह निर्देश किस कानूनी अधिकार के तहत जारी किए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने दलील दी कि निर्देश वापस ले लिए जाने के बावजूद उनके जारी होने की परिस्थितियों और कानूनी अधिकार की जांच जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक छात्र तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालयों में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एडवोकेट एक्ट 1961 के तहत बीएसआई को लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की न तो विधायी और न ही निहित शक्ति प्राप्त है। पीठ ने बीएसआई के 13 अगस्त और उसके बाद जारी संबंधित सभी कम्युनिकेशन को बिना कानूनी अधिकार के जारी घोषित किया और पहले दिए गए अंतरिम निर्देशों को अंतिम रूप दे दिया। और याचिका निपटा दी।

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