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कोर्ट ने पुलिस पर बवाल, कहा- वर्दी है तो कुछ भी कर सकते हो?

कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुरुवार को तय कानूनी नियमों का पालन किए बिना गैर-कानूनी गिरफ्तारियां करने वाले पुलिस अधिकारियों की कड़ी आलोचना की।

26 जून 2026 को 03:25 pm बजे
कोर्ट ने पुलिस पर बवाल, कहा- वर्दी है तो कुछ भी कर सकते हो?

सौजन्य से:- Jansatta

कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुरुवार को तय कानूनी नियमों का पालन किए बिना गैर-कानूनी गिरफ्तारियां करने वाले पुलिस अधिकारियों की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या पुलिस को लगता है कि वर्दी होने का मतलब है कि वे कानून की परवाह किए बिना कुछ भी कर सकते हैं।

जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने पत्नी की शिकायत पर दर्ज धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार एक व्यक्ति को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया और बागलूर पुलिस स्टेशन से जुड़े जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का आदेश दिया। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जज ने चेतावनी देते हुए कहा, “तुम्हारे पास वर्दी है, तो क्या तुम कुछ भी कर सकते हो? क्या किसी व्यक्ति को जेल भेजना कोई खेल है? क्या आपको लगता है कि किसी को जेल भेजना कोई खेल है? अगर कोई अपराध हुआ है, तो निश्चित रूप से उसे जेल भेजें, लेकिन कानून के अनुसार।”

शिकायतकर्ता के पति को इतनी जल्दबाजी में क्यों गिरफ्तार किया गया- कोर्ट

बेंच ने सवाल किया कि धोखाधड़ी के मामले में शिकायतकर्ता के पति को इतनी जल्दबाजी में क्यों गिरफ्तार किया गया। बेंच ने कहा, “क्या पत्नी के शिकायत दर्ज करते ही पति को जेल भेज दिया जाना चाहिए? क्या धोखाधड़ी के मामले में आप उसे जेल भेज सकते हैं? आरोप है कि पति-पत्नी के बीच पार्टनरशिप में धोखाधड़ी की गई है। पति लॉक-अप में क्यों है?”

आरोपी व्यक्ति के वकील, एडवोकेट त्रिविक्रम एस ने बताया कि अपराध 19 दिसंबर 2025 को दर्ज किया गया था। आरोप था कि पति ने पत्नी के साइन जाली किए, पार्टनरशिप डीड बनाई और उसकी जानकारी के बिना करंट अकाउंट खोला। यह तर्क दिया गया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद तीन महीने से ज्यादा समय तक कोई ठोस जांच नहीं की गई और फिर अचानक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया।

नए एसएचओ ने मामले में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई- कोर्ट

कोर्ट ने पाया कि पहले जांच अधिकारी ने तीन महीने से ज्यादा समय तक कोई खास जांच नहीं की। इसके बाद, नए एसएचओ रमेश ने कार्यभार संभाला और कथित तौर पर मामले में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। अधिकारी ने याचिकाकर्ता (आरोपी व्यक्ति) को पेश होने के लिए नोटिस जारी किया और सहयोग न करने का आरोप लगाते हुए अपराध दर्ज होने के चार महीने से ज्यादा समय बाद उसे हिरासत में ले लिया।

जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से कानून स्पष्ट है कि गिरफ्तारी आखिरी विकल्प होना चाहिए, खासकर उन अपराधों में जिनमें सात साल या उससे कम की सजा का प्रावधान है। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी को सही ठहराने के लिए कोई ठोस वजह नहीं थी, सिवाय इस दावे के कि उसने जांच में सहयोग नहीं किया।

यह मानते हुए कि जांच अधिकारी को कानून के खिलाफ काम करने के लिए बख्शा नहीं जा सकता, कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को बागलूर पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने और 12 हफ्तों के अंदर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने अपराध दर्ज होने की तारीख से लेकर पदभार बदलने तक नाममात्र की भी जांच न करने के लिए पिछले जांच अधिकारी के आचरण की जांच का भी निर्देश दिया। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता की जेल से बिना किसी देरी के रिहाई सुनिश्चित करने के लिए तुरंत ईमेल के माध्यम से जेल अधिकारियों को आदेश की जानकारी दे।

यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना के पीड़ितों की जान बचाने के लिए दिए थे 5 प्रमुख निर्देश, किसी भी राज्य ने नहीं किया पालन

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