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उत्तर प्रदेश में अपराध को खत्म करने के दावे का क्या है सच?

उत्तर प्रदेश में सरकार के दावे निश्चित रूप से आम जनता की सुरक्षा के लिहाज से अहम हैं लेकिन सवाल है कि क्या राज्य में सरकार और पुलिस का प्रभाव वास्तव में इतना असरकारी है कि किसी भी वारदात को अंजाम देने से पहले अपराधी कानून से खौफ खाते हैं?

14 जुलाई 2026 को 02:13 am बजे
उत्तर प्रदेश में अपराध को खत्म करने के दावे का क्या है सच?

सौजन्य से:- Jansatta

उत्तर प्रदेश में सरकार का दावा रहा है कि उसने अपराध और अपराधियों के खिलाफ जिस स्तर पर सख्ती और कार्रवाई की है, उसकी वजह से राज्य की जनता खुद को सुरक्षित महसूस करती है। खासतौर पर महिलाओं के लिए एक सुरक्षित माहौल बना है और कहीं भी आने-जाने में उन्हें किसी तरह के असुरक्षा-भाव से नहीं गुजरना पड़ता।

सरकार के इस तरह के दावे निश्चित रूप से आम जनता की सुरक्षा के लिहाज से अहम हैं, लेकिन सवाल है कि क्या राज्य में सरकार और पुलिस का प्रभाव वास्तव में इतना असरकारी है कि किसी भी वारदात को अंजाम देने से पहले अपराधी कानून से खौफ खाते हैं! गौरतलब है कि गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन इलाके में निर्माणाधीन व्यावसायिक परिसर में सात वर्षीय बच्ची का शव मिला, जिसकी हालत देख कर उससे बलात्कार के बाद उसकी हत्या की आशंका भी जताई गई है।

खबर के मुताबिक, वहीं मजदूरी कर रहे परिवार की उस बच्ची को बहला-फुसला कर ले जाया गया और इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया गया। इस घटना के अलावा भी हाल के दिनों में नाबालिग बच्चियों से बलात्कार या उनकी हत्या के अन्य मामले सामने आए और न्याय की मांग के साथ लोगों को सड़क पर उतरना पड़ा।

यह छिपा नहीं है कि आए दिन राज्य सरकार अपना प्रभाव साबित करने के उद्देश्य से अपराध को खत्म कर देने की दुहाई देती रहती है। यह भी दावा किया जाता रहता है कि कानून के डर से अब अपराधी राज्य छोड़ कर भाग चुके हैं। अगर सरकार के दावे सही हैं, तो ऐसा क्यों है कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के भीतर कानून का कोई खौफ नहीं दिखता और वे महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराधों को अंजाम देने से भी नहीं हिचक रहे?

यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि कई बार आपराधिक घटनाओं की संख्या थानों में दर्ज आंकड़ों के मुकाबले वास्तव में कहीं ज्यादा होती हैं। कहने को महिलाओं के लिए राज्य को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से कानून से लेकर हर स्तर पर चौकसी बरतने और हेल्पलाइन की व्यवस्था करने जैसे उपाय किए गए हैं। मगर सच्चाई यह है कि सरकारी दावों के समांतर अभी भी ऐसा तंत्र सक्रिय करने की जरूरत है, जो महिलाओं के लिए वास्तव में सुरक्षित माहौल बना सके।

यह भी पढ़ें- जांच होती है, रिपोर्ट आती है… फिर हादसे क्यों नहीं रुकते?

आमतौर पर किसी हादसे के बाद उसके कारणों पर बात होती है। सरकार मामले की तह तक पहुंचने के लिए जांच एजेंसी गठित करती है। मगर उसके बाद शायद ही कभी कारणों के तमाम पहलुओं के आधार पर हादसों से निपटने के लिए कोई व्यापक कार्ययोजना बनती है और उसे एक नियमन की तरह देखा जाता है। पढ़ें पूरी खबर

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