तिब्बती निर्वासित संसद ने जातीय एकता कानून की कड़ी निंदा की
धर्मशाला में 18वीं तिब्बती निर्वासित संसद का सत्र स्पीकर डोलमा त्सेरिंग के उद्घाटन भाषण से शुरू हुआ, जिसमें नेपाल की बाढ़ से हुई पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई। उन्होंने जातीय एकता और प्रगति कानून को लोगों की पहचान, धर्म और संस्कृति पर असर डालने वाली नीति बताया और संसद की स्थायी समिति द्वारा इसकी व्यापक समीक्षा का उल्लेख किया।

सौजन्य से:- livehindustan.com
निर्वासित तिब्बती संसद ने जातीय एकता कानून की निंदा की
हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
धर्मशाला में 18वीं तिब्बती निर्वासित संसद का दूसरा सत्र स्पीकर डोलमा त्सेरिंग के भाषण के साथ शुरू हुआ। इस दौरान, नेपाल में बाढ़ से मारे गए लोगों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त की गईं। डोलमा त्सेरिंग ने जातीय एकता और प्रगति कानून की निंदा की, जो लोगों की पहचान और संस्कृति को प्रभावित कर सकता है।
धर्मशाला, एजेंसी। 18वीं तिब्बती निर्वासित संसद का दूसरा सत्र स्पीकर डोलमा त्सेरिंग के उद्घाटन भाषण के साथ शुरू हुआ। इस दौरान एकजुटता और शोक प्रस्ताव पेश किए गए। इनमें नेपाल में बाढ़ से जान गंवाने वाले लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई। इस दौरान जातीय एकता और प्रगति कानून पर अध्यक्ष डोलमा त्सेरिंग ने कहा कि संसद ने इसकी निंदा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह नीति लोगों की पहचान, धर्म, संस्कृति और जीवन शैली को पूरी तरह से प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा, संसद की स्थायी समिति के सदस्यों ने इसका काफी हद तक इसकी समीक्षा की है।
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