दिल्ली हाई कोर्ट में 'भूलने का अधिकार' को चुनौती
'भूल दिए जाने के अधिकार' के लहजे में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला खुली न्याय व्यवस्था और संविधान के खिलाफ, इंडिया कानून ने चुनौती दी है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
'भूलने का अधिकार' खुली न्याय व्यवस्था और संविधान के खिलाफ', इंडिया कानून की दिल्ली हाई कोर्ट में गुहार
Edited by: दीपांशु|नवभारतटाइम्स.कॉम•
कानूनी डेटाबेस 'इंडिया कानून' ने दिल्ली हाई कोर्ट के सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 'भूल दिए जाने के अधिकार' के तहत अदालती आदेशों से नाम-आधारित सर्च को हटाने का निर्देश दिया गया था।
दिल्ली हाई कोर्ट से किया ये अनुरोध
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्लेटफॉर्म और सर्च इंजनों को अदालती आदेशों से जुड़ी "नाम-आधारित खोज सुविधा" को बंद (डी-इंडेक्स) करने का निर्देश दिया था। मंगलवार को चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच के सामने मामले को 21 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया गया।क्यों दी गई फैसले को चुनौती?
इंडिया कानून ने अपनी अपील में कहा कि सिंगल-जज का 29 मई का फैसला "सामान्य और अस्पष्ट" है, जो सूचना के अधिकार और खुली न्याय व्यवस्था के सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में तर्क दिया गया कि यह आदेश सेंसरशिप को बढ़ावा देता है और संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(g) के तहत व्यापार व पेशे की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। प्लेटफॉर्म ने किया स्पष्ट
प्लेटफॉर्म ने स्पष्ट किया कि वह सार्वजनिक न्यायिक रिकॉर्ड को होस्ट कर व्यापक जनहित में मुफ्त कानूनी डेटाबेस प्रदान करता है, और किसी व्यक्ति की मुकदमेबाजी का इतिहास मिटाने की इच्छा दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त, अपील में कहा गया कि सिंगल जज ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'के एस पुट्टास्वामी' (निजता का अधिकार) फैसले को गलत समझा, क्योंकि उसमें न्यायिक रिकॉर्ड से ऐसा कोई बिना शर्त अधिकार नहीं दिया गया है।क्या था सिंगल जज का फैसला?
इससे पहले, 29 मई को सिंगल-जज बेंच ने 35 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 'भूल दिए जाने के अधिकार' को बरकरार रखा था। अदालत ने निर्देश दिया था कि Google जैसे सर्च इंजन और इंडिया कानून उन मामलों के न्यायिक रिकॉर्ड को नाम-आधारित सर्च में न दिखाएं जो निजी प्रकृति के हों या जिनमें आरोपी बरी, आरोपमुक्त या समझौता कर चुका हो। मामले में क्या है कोर्ट का मानना
अदालत का मानना था कि ऑनलाइन रिकॉर्ड के साथ नाम का लगातार जुड़े रहना व्यक्ति के सम्मान और सूचनात्मक गोपनीयता को नुकसान पहुंचाता है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया था कि महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराध, सार्वजनिक विश्वास तोड़ने और सरकारी कर्मचारियों से जुड़े गंभीर मामलों में डी-इंडेक्सिंग लागू नहीं होगी, और केस नंबर या साइटेशन के जरिए रिकॉर्ड तक पहुंच बनी रहेगी।वकीलों की हड़ताल के बीच हुआ अनुरोध
यह कानूनी घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया जब दिल्ली की जिला अदालतों के आर्थिक अधिकार क्षेत्र को 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये करने के प्रस्ताव के विरोध में वकील मंगलवार को काम से दूर रहे। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने किया विरोध
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इस बदलाव का विरोध करते हुए कहा है कि इससे वकीलों की आजीविका और पेशेवर हितों पर बुरा असर पड़ेगा। फिलहाल हाई कोर्ट 2 करोड़ से ऊपर के दीवानी मामलों को देखता है, लेकिन इस नए प्रस्ताव के बाद 10 करोड़ तक के मामले जिला अदालतों में ट्रांसफर हो जाएंगे।कन्वर्सेशन शुरू करें
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