सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी चोट, हत्या के मामले में 'लाश नहीं तो मर्डर नहीं' वाली दलील पूरी तरह से खारिज!
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर पीड़ित की लाश कभी नहीं भी मिलती है, तब भी आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Supreme Court News: हत्या के मामले में अकसर ही अपराधी 'लाश नहीं तो मर्डर नहीं' वाली दलील देते हैं। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी पर अहम आदेश सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अपराधियों के सबसे बड़े ढाल पर ही चोट पहुंचाई है। जानें पूरा मामला।
नई दिल्ली: लाश नहीं मिलने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हत्या नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि अगर पीड़ित की लाश कभी नहीं भी मिलती है, तब भी आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत सिर्फ यह साबित करना जरूरी है कि अपराध हुआ है, न कि लाश पेश करना। इसके साथ ही चेतावनी दी कि अगर लाश पेश करने की शर्त रखी गई, तो ऐसे हत्यारे सजा से बच निकलेंगे जो लाश को ठिकाने लगाने में कामयाब हो जाते हैं।
जान लीजिए पूरा मामला क्या है
सुप्रीम कोर्ट यह फैसला तब आया जब जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने असम के एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। उस व्यक्ति को 10 साल की गोद ली हुई बच्ची की हत्या का दोषी ठहराया गया था। आरोप है कि बच्ची का शव नदी में फेंक दिया गया था और वह कभी नहीं मिल पाया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट के एक जैसे फैसलों को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि शव न मिलने के बावजूद, अभियोजन पक्ष ने भरोसेमंद सबूतों के जरिए अपराध साबित कर दिया था।
अदालत में 'कॉर्पस डेलिक्टी' का जिक्र
HT की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को जारी अपने फैसले में बेंच से कहा कि किसी व्यक्ति को दूसरे की हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही उस दूसरे व्यक्ति का शव न मिला हो। बेंच ने साफ किया कि कॉर्पस डेलिक्टी (corpus delicti) का मतलब है कि अपराध हुआ है, न कि यह कि मारे गए व्यक्ति का शव बरामद हो गया है। यह फैसला असम के देबोजित पंकीका की अपील पर आया, जिन्होंने 2015 के एक मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 201 (सबूत मिटाना) के तहत अपनी सजा को चुनौती दी थी।
मासूम की मौत से जुड़ा मामला क्या है?
अभियोजन पक्ष का मामला था कि जिस बच्ची की मौत हुई, वह अपीलकर्ता और उसकी मां (जो उस लड़की की मौसी/बुआ थीं) के साथ रहती थी। जब मां इलाज के लिए घर से बाहर गईं और बच्ची को पूरी तरह अपीलकर्ता की देखरेख में छोड़ गईं। इसी के बाद बच्ची गायब हो गई। बाद में मामले की जांच शुरू हुई, जांच एजेंसी इस दौरान शव बरामद नहीं कर पाई। इसी के बाद गवाहों के बयान और कई अहम सबूतों के आधार पर शीर्ष अदालत ने बचाव पक्ष की दलील को खारिज कर दिया कि शव न मिलने से अभियोजन पक्ष का मामला बुरी तरह कमजोर हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट में फैसले में कह दी बड़ी बात
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से 'कॉर्पस डेलिक्टी' के सिद्धांत के दायरे में आता है। कोर्ट ने समझाया कि हत्या के मामले में इस सिद्धांत के दो पहलू होते हैं- मौत का सबूत और इस बात का सबूत कि मौत किसी दूसरे व्यक्ति के आपराधिक कृत्य के कारण हुई। जहां एक पहलू को सीधे तौर पर साबित किया जा सकता है, वहीं दूसरे को परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर स्थापित किया जा सकता है।
लेखक के बारे मेंरुचिर शुक्लारुचिर शुक्ला, नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में असिस्टेंट न्यूज एडिटर हैं। फरवरी 2020 से नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से जुड़े हैं। वह होमपेज टीम के सदस्य हैं। शिफ्ट देखने के साथ न्यूज स्टोरी लिखने और संपादन की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। खबरों के अलग-अलग एंगल से डेवलप करने में माहिर है। करियर की शुरुआत 2011 में न्यूज एजेंसी से की, इस दौरान डेस्क के साथ-साथ रिपोर्टिंग में भी हाथ आजमाया। कई अहम खबरों को ब्रेक किया। राजनीतिक, सामाजिक, क्राइम, पॉजिटिव न्यूज में विशेषज्ञता रखते हैं। न्यूज एजेंसी से शुरुआत के बाद टीवी फिर डिजिटल न्यूज टीम का हिस्सा बने। करीब 13 साल से डिजिटल मीडिया में कार्यरत हैं।
विशेषज्ञता : रुचिर शुक्ला की पॉलिटिकल खबरों में खास रुचि है। ब्रेकिंग पर नजर रहती है। बड़ी खबरों से जुड़ी इनसाइड स्टोरी, एनालिसिस में भी महारत रखते हैं। क्राइम, पॉजिटिव, सक्सेस स्टोरी के साथ ग्लोबल पॉलिटिकल मुद्दों पर भी निगाहें रहती हैं।
पत्रकारिता का अनुभव : रुचिर शुक्ला ने 2011 में News Point न्यूज एजेंसी से करियर की शुरुआत की, जहां डेस्क के साथ रिपोर्टिंग में हाथ आजमाया। इस दौरान बीजेपी और कांग्रेस बीट को कवर किया। कई खबरें ब्रेक की। इस दौरान पंजाब पुलिस से जुड़ी एक डॉक्यूमेंट्री में भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की। 2012 में मैजिक टीवी न्यूज चैनल से जुड़े। 2013 में इंडिया न्यूज के बिहार-झारखंड चैनल से जुड़े। अप्रैल 2014 में अमर उजाला डिजिटल से जुड़े। इस दौरान होम टीम में कई अहम जिम्मेदारी संभाली। करीब ढाई साल तक अमर उजाला डिजिटल में रहने के बाद अगस्त 2016 में वनइंडिया हिंदी से जुड़े। यहां उन्होंने होम टीम और शिफ्ट की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान यूपी असेंबली इलेक्शन 2017 को लेकर अहम जिम्मेदारी मिली। वनइंडिया हिंदी में रहते हुए लोकसभा चुनाव 2019 कवर किया। जिसमें कई खास विश्लेषण और स्पेशल स्टोरी की। इसके बाद 2011 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी खास रोल निभाया। फरवरी 2020 में नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से जुड़ने के बाद कई अहम जिम्मेदारियों को संभाला। फिलहाल रुचिर होम पेज और शिफ्ट की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। रुचिर शुक्ला ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के महाराजा अग्रसेन कॉलेज से हिंदी ऑनर्स में ग्रेजुएशन किया है।... और पढ़ें
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