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दल-बदल कानून का सिस्टम ही समस्या है: अभिषेक मनु सिंघवी का दावा

राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने दल-बदल विरोधी कानून पर बड़ा आरोप लगाया है. उनका कहना है कि यह कानून सफल नहीं हो पाया और इसकी जगह एक आसान कानून लाना चाहिए, जिसमें जो भी विधायक पार्टी बदलते हैं वह पहले इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ने के लिए जनता से सीधी बात करें.

26 जून 2026 को 10:24 am बजे
दल-बदल कानून का सिस्टम ही समस्या है: अभिषेक मनु सिंघवी का दावा

सौजन्य से:- ThePrint Hindi

नई दिल्ली: राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दल-बदल विरोधी कानून लागू करने के सिस्टम को “look like an ass” बताया है यानी यह कानून मजाक बन गया है. उन्होंने इस कानून को खत्म करने और इसकी जगह एक आसान कानून लाने की मांग की है. कांग्रेस नेता का कहना है कि जो नेता पार्टी बदलते हैं, उन्हें इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ना चाहिए.

सिंघवी ने भरोसा जताया कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) और आम आदमी पार्टी (AAP) जैसे पुराने सहयोगियों के साथ बिगड़े रिश्ते फिर से सुधारे जा सकते हैं.

ThePrint को दिए एक खास इंटरव्यू में सिंघवी ने कहा कि 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के जरिए लाया गया दल-बदल विरोधी कानून, जिसका मकसद राजनीतिक दल-बदल रोकना था, व्यवहार में सफल नहीं हुआ. इसकी वजह यह है कि अयोग्यता पर फैसला लेने का अधिकार सिर्फ विधानसभा या लोकसभा के स्पीकर के पास होता है, और स्पीकर खुद भी एक राजनीतिक व्यक्ति होता है.

सिंघवी ने कहा, “एक पुरानी कहावत है कि ‘कानून गधा होता है’. मैं ऐसा नहीं मानता. लेकिन भारत के दल-बदल विरोधी कानून के साथ जो कुछ हुआ है, उसने इसे जरूर मजाक जैसा बना दिया है.”

उन्होंने कहा कि स्पीकर से पूरी तरह निष्पक्ष फैसले की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि वह भी किसी राजनीतिक पार्टी के टिकट पर चुनकर आता है.

उन्होंने कहा, “स्पीकर का राजनीतिक जीवन उसकी पार्टी पर ही निर्भर करता है. इसलिए उससे वह निष्पक्षता, ईमानदारी और स्वतंत्रता की उम्मीद नहीं की जा सकती, जो दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल के मामलों में फैसला लेने के लिए जरूरी है.”

सिंघवी ने कहा कि मौजूदा कानून को खत्म कर उसकी जगह एक बहुत आसान नियम लाया जाना चाहिए. इसके तहत जो भी चुना हुआ जनप्रतिनिधि पार्टी बदले, उसे पहले इस्तीफा देना होगा और फिर जनता से दोबारा जनादेश लेना होगा.

उन्होंने कहा, “मैं खुले तौर पर इस कानून को खत्म करने और उसकी जगह दो-तीन लाइन का आसान नियम लाने की बात कर चुका हूं. जो भी व्यक्ति किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर जीतकर आए और बाद में सीधे या परोक्ष रूप से दूसरी पार्टी का साथ दे, उसे पहले इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ना चाहिए.”

सिंघवी के मुताबिक, “सबसे बड़ी समस्या यह है कि पूरी प्रक्रिया ही सजा बन जाती है. जब तक दल-बदल का मामला अदालत तक पहुंचता है और फैसला आता है, तब तक राजनीतिक मकसद पूरा हो चुका होता है और कार्यकाल भी बीत जाता है.”

उन्होंने महाराष्ट्र के दल-बदल मामले का उदाहरण दिया, जो अब भी अदालत में लंबित है. उन्होंने कहा कि कई बार कानूनी प्रक्रिया विधानसभा का पूरा कार्यकाल खत्म होने के बाद भी चलती रहती है.

उन्होंने कहा, “कानून सबको पता है. लोग जानबूझकर इसका उल्लंघन करते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि अदालत का फैसला आने तक सदन का कार्यकाल खत्म हो सकता है.”

‘दो-तिहाई’ वाली छूट को गलत समझा

सिंघवी ने दल-बदल विरोधी कानून में मौजूद तथाकथित “दो-तिहाई छूट” को लेकर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि सिर्फ दो-तिहाई विधायक दूसरी पार्टी में चले जाएं, इससे अपने आप कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिल जाती.

उन्होंने कहा कि दसवीं अनुसूची की धारा 4 के तहत दो शर्तें एक साथ पूरी होनी जरूरी हैं. पहली, मूल राजनीतिक पार्टी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करे. दूसरी, उस पार्टी के दो-तिहाई विधायक उस विलय को मंजूरी दें.

उन्होंने कहा, “लोग सिर्फ दूसरी शर्त की बात करते हैं. पहली शर्त को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. जबकि दोनों शर्तें एक साथ पूरी होना जरूरी हैं.”

‘पैसा और जांच एजेंसियां दल-बदल को बढ़ावा दे रही हैं’

सिंघवी ने माना कि कई बार नेताओं की अपनी पार्टी से नाराजगी भी दल-बदल की वजह बनती है. लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी ने पैसे और जांच एजेंसियों के जरिए इसे बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया है.

उन्होंने कहा, “मैं उन लोगों में नहीं हूं जो मानते हैं कि हर दल-बदल सिर्फ दूसरी पार्टी की साजिश से होता है. मूल पार्टी के अंदर भी असंतोष होना जरूरी है.”

उन्होंने आगे कहा, “लेकिन जिस चीज ने दल-बदल को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचाया है, वह है Vitamin M यानी पैसा और जांच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल.”

उन्होंने आरोप लगाया कि आजाद भारत के इतिहास में किसी भी सरकार ने राजनीतिक समीकरण बदलने के लिए इन साधनों का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं किया.

जब उनसे उन कांग्रेस नेताओं के बारे में पूछा गया जो बीजेपी में गए लेकिन बाद में किनारे कर दिए गए, तो सिंघवी ने कहा कि बीजेपी की रणनीति रही है कि पहले नेताओं को अपनी ओर लाओ, फिर पार्टी में शामिल करो और बाद में ज्यादातर को नजरअंदाज कर दो. जबकि अहम पद अपने पुराने कार्यकर्ताओं के लिए बचाकर रखे जाते हैं.

2024 के बाद कांग्रेस की रफ्तार धीमी पड़ गई.

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष के प्रदर्शन पर बात करते हुए सिंघवी ने माना कि लोकसभा चुनाव के बाद जो माहौल बना था, वह बाद के विधानसभा चुनावों में कायम नहीं रह सका.

उन्होंने कहा, “मैं मानता हूं कि यह निराशाजनक था. लोकसभा चुनाव के बाद माहौल हमारे पक्ष में था, लेकिन उसे बनाए नहीं रखा जा सका.”

उन्होंने कहा कि इसकी सबसे बड़ी वजह INDIA गठबंधन के भीतर जोश और एकजुटता की कमी थी.

सिंघवी ने कहा कि राज्य चुनावों में विपक्षी दल एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहेंगे, लेकिन राष्ट्रीय चुनाव में उन्हें वोटों का बंटवारा कम करना होगा.

उन्होंने कहा, “जब मोदी जी अपने सबसे अच्छे दौर में भी होते हैं, तब भी उन्हें आमतौर पर 39 या 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिलते. करीब 60 प्रतिशत वोट उनके खिलाफ जाते हैं. समस्या यह है कि ये वोट अलग-अलग दलों में बंट जाते हैं.”

सिंघवी ने यह भी कहा कि व्यवहारिक राजनीति यही है कि राज्य चुनावों में सहयोगी दल एक-दूसरे से मुकाबला करें, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले फिर साथ आ जाएं.

उन्होंने कहा, “यह विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन भारत की राजनीति कई दशकों से ऐसे ही चलती आई है. राजनीति में व्यवहारिक सोच बहुत जरूरी है.”

‘DMK और AAP को साथ लाया जा सकता है’

कांग्रेस और DMK के रिश्तों पर सिंघवी ने कहा कि हाल की तनातनी के बावजूद वह आशावादी हैं. यह तनाव अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के साथ कांग्रेस के गठबंधन के फैसले के बाद बढ़ा.

उन्होंने कहा, “मुझे इस बात का दुख है क्योंकि DMK शायद हमारी सबसे पुरानी और सबसे मजबूत सहयोगी पार्टियों में से एक रही है.”

उन्होंने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि DMK और AAP को फिर से साथ लाया जा सकता है.”

इस बात को खारिज करते हुए कि कांग्रेस ने DMK की जगह TVK को चुन लिया है, सिंघवी ने कहा कि इस गठबंधन को गलत समझा गया है.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि DMK कांग्रेस की मंशा को पूरी तरह समझ नहीं पाई.”

उन्होंने कहा कि कांग्रेस DMK के खिलाफ काम नहीं कर रही है, बल्कि तमिलनाडु में अपने संगठन की इच्छाओं को भी ध्यान में रख रही है.

उन्होंने कहा, “तमिलनाडु में हमारे कार्यकर्ताओं को अब आगे बढ़ने की उम्मीद दिखाई दे रही है. वे सरकार का हिस्सा बनना चाहते हैं. वे कांग्रेस संगठन को मजबूत करना चाहते हैं. TVK हमारे पास सम्मान और गरिमा के साथ आई. फिर हम DMK के दोस्त रहते हुए TVK के साथ राजनीतिक बातचीत क्यों नहीं कर सकते.”

जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस TVK के साथ गठबंधन करने के बजाय बाहर से समर्थन दे सकती थी, तो सिंघवी ने जवाब दिया, “मुझे लगता है कि कहीं न कहीं बात सही तरीके से समझी नहीं गई.”

उन्होंने भरोसा जताया कि यह गलतफहमी दूर हो सकती है. उन्होंने कहा कि यही बात कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के रिश्तों पर भी लागू होती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

यह भी पढ़ें: पहचान और नागरिकता: कौन आपको नागरिक बनाता है और वे कौन से दस्तावेज हैं जो कानूनी प्रमाण नहीं हैं

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