बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट के लिए माता‑पिता की अनुमति अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी और कानून एवं न्याय मंत्रालयों से जनहित याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर केवल अभिभावक की सहमति और ई‑केवाईसी सत्यापन के बाद ही उपयोग की अनुमति देने की मांग की गई है। याचिका में सोशल मीडिया में अनुचित सामग्री से बचाव और बच्चों के अपहरण मामलों की तेज़ और समान जांच हेतु मानक प्रक्रिया बनाने की भी माँग की गई है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय से एक जनहित याचिका पर जवाब मांगा है। याचिका में 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लैटफॉर्म के इस्तेमाल के दौरान कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग की गई है। यह याचिका NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस ने दाखिल की है। यह भी मांग की गई है। कि सोशल मीडिया को ऐसे इंतजाम करने होंगे, जिनसे बच्चों को खतरनाक या अनुचित सामग्री से बचाया जा सके।
डिजिटल सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश की मांग
जनहित याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में बदलाव करने या बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए अलग दिशा- निर्देश बनाने की मांग की गई है। इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चे को डिजिटल प्लैटफॉर्म इस्तेमाल करने की अनुमति तभी देने की मांग है, जब उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति हो । अभिभावक की पहचान और उसके अधिकार की पुष्टि के लिए ई-केवाईसी या दूसरी पहचान सत्यापन व्यवस्था लागू करने की भी मांग की गई है।नाबालिग करार नहीं कर सकता तो यहां कैसे?
याचिका में भारतीय कॉन्ट्रैक्ट ऐक्ट की धारा 11 का हवाला दिया गया है। इसके तहत नाबालिग कानूनी रूप से अनुबंध करने में सक्षम नहीं है। याचिका में फेसबुक और स्नैपचैट का उदाहरण देते हुए कहा गया है। कि इन प्लैटफॉर्म पर भारत में 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की अनुमति है, जबकि यहां 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति नाबालिग है।बच्चों के मौलिक अधिकारों पर खतरे का दावा
याचिका में कहा गया है कि प्रभावी आयु पुष्टि और अभिभावकों की सुरक्षा व्यवस्था के बिना बच्चों को पहुंच देना केवल नियमों की कमी का मामला नहीं है, इससे बच्चों की गरिमा, निजता, सुरक्षा, स्वस्थ विकास और समग्र कल्याण से जुड़े मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।बच्चों के अपहरण पर मांगा जवाब
बच्चों के अपहरण और किडनैपिंग के मामलों की जांच के लिए देशभर में एक समान व्यवस्था बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्यो से जवाब मांगा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने केंद्र, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों, संबंधित मंत्रालयों और विधि आयोग को नोटिस जारी किया। अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि लापता और अगवा बच्चों के मामलों की जांच में देरी गंभीर समस्या है। मांग की गई है कि ऐसे मामलों के लिए मानक प्रश्नावली और विशेष जांच प्रक्रिया बनाई जाए। जांच एसीपी/एसएचओ से नीचे के अधिकारी को न दी जाए और इसे तय समय में पूरा किया जाए। याचिका में अपहरण के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालते बनाने और एक साल के भीतर मुकदमे का फैसला करने की भी मांग की गई है। साथ ही आरोपियों की चल-अचल संपत्तियों की जांच और जरूरत पड़ने पर मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति तथा का धन से जुड़े कानूनों के इस्तेमाल की माग की गई है।दिल्ली के लोगों को अब मोबाइल पर मिलेगा ट्रैफिक अपडेट, जानें कैसे
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