विदेशी नागरिक को वापस भेजने से पहले नागरिकता की पुष्टि होना आवश्यक: केंद्र सरकार
केंद्र सरकार ने कहा कि जिस विदेशी नागरिक की नागरिकता की पुष्टि नहीं हुई, उसे तब तक वापस नहीं भेजा जा सकता, जब तक कि उसका देश उसे स्वीकार न करे। सरकार ने कहा कि नागरिकता की पुष्टि के बिना वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू भी नहीं की जा सकती।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया- किसी विदेशी नागरिक को उसके देश की मंज़ूरी के बिना वापस नहीं भेजा जा सकता
Shahadat
1 Aug 2026 10:56 AM IST
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जिस विदेशी नागरिक की नागरिकता की पुष्टि नहीं हुई, उसे तब तक वापस नहीं भेजा जा सकता, जब तक कि उसका देश उसकी नागरिकता की पुष्टि न कर दे और उसे स्वीकार करने के लिए सहमत न हो जाए। सरकार ने कहा कि नागरिकता की पुष्टि के बिना वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू भी नहीं की जा सकती।
यह जानकारी गृह मंत्रालय (MHA) ने राजुबाला दास की लंबित रिट याचिका के जवाब में दाखिल एक हलफनामे में दी। यह याचिका उन लोगों से संबंधित है, जिन्हें विदेशी घोषित किया गया लेकिन जिनकी नागरिकता का पता नहीं है। यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट के 21 मार्च, 2025 के आदेश के पालन में दाखिल किया गया।
गृह मंत्रालय ने कहा कि मौजूदा प्रक्रिया के तहत सज़ा या अदालती कार्यवाही पूरी होने के बाद संबंधित राज्य सरकार, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन या विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) द्वारा किसी विदेशी नागरिक को सामान्य रूप से वापस भेजा जा सकता है, बशर्ते उस व्यक्ति के पास वैध यात्रा दस्तावेज़ या पासपोर्ट हो और उसके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित न हो।
हालांकि, अगर विदेशी नागरिक के पास वैध यात्रा दस्तावेज़ नहीं है तो सरकार ने कहा कि नागरिकता की पुष्टि के बाद संबंधित देश के दूतावास या उच्चायोग के माध्यम से ऐसा दस्तावेज़ प्राप्त करना आवश्यक है।
हलफनामे में कहा गया,
"किसी विदेशी नागरिक को वापस भेजने से पहले नागरिकता की पुष्टि की प्रक्रिया के माध्यम से संबंधित देश के दूतावास/उच्चायोग से आवश्यक यात्रा दस्तावेज़ प्राप्त करना ज़रूरी है।"
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि वापस भेजने की प्रक्रिया संबंधित विदेशी देश के सहयोग पर निर्भर करती है, केंद्र सरकार ने कहा:
"जिस विदेशी नागरिक की नागरिकता अज्ञात/अपुष्ट है, उसे उसके देश तभी वापस भेजा जा सकता है, जब उसकी नागरिकता की पुष्टि हो जाए/उसके पास वैध यात्रा दस्तावेज़ हो/संबंधित देश उसे स्वीकार कर ले। नागरिकता की पुष्टि के बिना वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।"
हलफनामे के अनुसार, ऐसे मामलों में संबंधित राज्य सरकार या FRRO/FRO विदेश मंत्रालय के साथ मामला उठा सकते हैं। वे गिरफ्तारी या FIR दर्ज होने (जो भी पहले हो) के तुरंत बाद विदेशी नागरिक का विवरण और तस्वीर उपलब्ध करा सकते हैं ताकि यात्रा दस्तावेज़ जारी करने में आसानी हो।
केंद्र सरकार ने आगे कहा कि जब तक नागरिकता की पुष्टि नहीं हो जाती और वापस भेजना संभव नहीं हो जाता, तब तक ऐसे अवैध प्रवासियों की आवाजाही पर कानूनी रूप से प्रतिबंध होना चाहिए। सरकार ने तर्क दिया कि भागने से रोकने, राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करने और अंततः उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए ऐसा करना ज़रूरी है।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि नागरिकता की पुष्टि करना विदेशी सरकार का एक संप्रभु काम है। इसलिए इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की जा सकती। नतीजतन, सरकार का कहना है कि ऐसे लोगों को तब तक तय होल्डिंग सेंटरों में रखा जाना चाहिए, जब तक कि उनकी नागरिकता की पुष्टि न हो जाए और उन्हें वापस न भेज दिया जाए।
हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के 2012 के 'भीम सिंह बनाम भारत संघ' मामले के फैसले का भी ज़िक्र किया गया। इस फैसले के बाद गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी थी कि जिन विदेशी नागरिकों की सज़ा पूरी हो चुकी है, लेकिन नागरिकता की पुष्टि न होने या यात्रा दस्तावेज़ न मिलने के कारण उन्हें वापस भेजने में देरी हो रही है, उन्हें जेल से रिहा किया जा सकता है। उन्हें जेल परिसर के बाहर उपयुक्त जगहों पर रखा जा सकता है, जहाँ उनकी आवाजाही पर पाबंदी हो और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया चल रही हो।
पिछले साल, कोर्ट ने केंद्र और असम सरकार से उन लोगों को वापस भेजने के लिए कदम न उठाने पर सवाल किया, जिन्हें विदेशी घोषित किया गया। एक संबंधित मामले (माजा दारूवाला बनाम भारत संघ) में, कोर्ट ने बांग्लादेशी होने के आरोपी लोगों को वापस भेजने के बजाय उन्हें अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने पर सवाल उठाया।
सुप्रीम कोर्ट में एक और मामला लंबित है, जिसमें पश्चिम बंगाल से कुछ लोगों को ज़बरदस्ती बांग्लादेश भेजने को चुनौती दी गई। केंद्र सरकार ने उन्हें वापस भेजने के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। हाल ही में, केंद्र सरकार ने मानवीय आधार पर एक गर्भवती महिला और उसके परिवार को वापस लाने का भरोसा सुप्रीम कोर्ट को दिलाया, जिन्हें ज़बरदस्ती बांग्लादेश भेज दिया गयाो।
Case Title – Rajubala Das v. Union of India and Anr | Writ Petition (Criminal) No. 234/2020
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